Report- Mukesh Prajapati, By: Vijay Yadav
Khaniyadhana Khan Chacha : शिवपुरी, कौन कहता है भारत में हिंदू मुस्लिम एकता या सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे में कमी आ गयी है। ऐसा सोचने वाले और देखने वाले इस खबर को पढ़ने के बाद अपना नजरिया बदल लेंगे। खनियांधाना में एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है।
यहां रियासतकालीन परंपरा से चली आ रही ‘श्री श्री 1008 बजरंग रामलीला’ में नगर के बस स्टैंड पर काम करने वाले ‘मिस्टर खान चाचा’ पिछले चार दशक से बिना कोई शुल्क या मेहनताना लिए निःस्वार्थ भाव से दशहरा पर्व पर दहन के लिए रावण का पुतला तैयार करते आ रहे हैं। आज उनके हाथ कांपने लगे हैं, शरीर में ताकत भी कम हो गई लेकिन उन्होंने फिर भी इस रिवायत को छोड़ा नहीं है। उनकी तीसरी पीढ़ी अब इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में उनकी मदद करती है।

Khaniyadhana Khan Chacha : खान चाचा 4 दशक के निभा रहे परंपरा
खनियांधाना की पावन धरा पर ‘टेकरी सरकार’ के साये में पिछले चार दशकों से गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा चिराग रोशन हो रहा है। बस स्टैंड पर सेवाएं देने वाले मिस्टर खान चाचा बीते 40 सालों से पूरी निष्ठा और निस्वार्थ भाव से रावण का पुतला तैयार करते हैं। खान चाचा बताते हैं कि रियासत काल में रावण बनाने वाले कारीगर के इंतकाल के बाद उन्होंने बचपन में ही इस काम को संभाला था।

Khaniyadhana Khan Chacha : बच्चों को भी पंरपरा से जोड़ा
वे सिर्फ पुतला ही नहीं बनाते, बल्कि रामलीला के मंच पर जटायु का किरदार निभाने से लेकर पर्दे और सीनरी बनाने का काम भी खुद करते थे। हालांकि अब उम्र के साथ उन्होंने खुद रामलीला में पाठ करना बंद कर दिया है। लेकिन उन्होंने अपने बच्चों और पोते पोतियों को जोड़ कर हिंदू मुस्लिम एकता और सनातनी परंपरा के साथ चलने की पंरपरा को जारी रखा है।
पैसों वाली बात तो देने वाला तो ऊपर वाला है साहब। जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, सेवा कर रहे हैं। न हिंदू बनूंगा, न मुसलमान बनूंगा; इंसान हूं, इंसान की औलाद बनूंगा। गांव-गांव और बस्तियों में आपसी प्रेम और सद्भावना होनी चाहिए।
बढ़ती उम्र और कमजोर होती सेहत के बावजूद खान चाचा का जज्बा कम नहीं हुआ है। उन्होंने अपने हुनर को अपने बेटे अनवर खान और नाती-पोतों को सिखा दिया है। आज खान परिवार की तीसरी पीढ़ी इस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ा रही है। खान चाचा बातचीत के दौरान संस्कृत के श्लोकों और दोहों के जरिए समाज को मानवता और एक पहचान का संदेश देते हैं।


