by: vijay nandan yadav
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : गणेश चतुर्थी के मौके पर देशभर में भगवान गणेश की पूजा-अर्चना हो रही है। मुंबई का लालबागचा राजा गणेशोत्सव का ऐसा नाम है, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु बप्पा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लालबागचा राजा की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई थी और पहली बार इसकी स्थापना कब की गई थी?
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : 1934 में हुई थी पहली स्थापना
लालबागचा राजा की पहली स्थापना 12 सितंबर 1934 को मुंबई के लालबाग-परेल इलाके में हुई थी। इसके पीछे स्थानीय मछुआरों, छोटे व्यापारियों और मिल मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
इस सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत में कुंवर जी जेठाभाई शाह, श्यामराव विष्णु बोधे, रामचंद्र तावड़े, वी.बी. कोरगांवकर और नखावा कोकम मामा सहित कई स्थानीय लोगों और नेताओं का योगदान बताया जाता है।

Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : बाजार बंद होने से पैदा हुआ संकट
लालबागचा राजा की कहानी उस दौर की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ी है। 1930 के दशक में मुंबई का लालबाग इलाका कपड़ा मिलों और मजदूरों की बड़ी आबादी के लिए जाना जाता था।
बताया जाता है कि 1932 में पेरू चाल का पुराना बाजार बंद हो गया था। इसका सीधा असर उन मछुआरों, फेरीवालों और छोटे व्यापारियों पर पड़ा, जिनकी रोजी-रोटी इसी बाजार से चलती थी। अचानक कारोबार की जगह छिन जाने से कई परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया।
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : कारोबार के लिए जगह मिले तो बप्पा की स्थापना का लिया संकल्प
मुश्किल हालात में विस्थापित व्यापारियों और कोली मछुआरा समुदाय के लोगों ने भगवान गणेश से मन्नत मांगी। उन्होंने संकल्प लिया कि यदि उन्हें कारोबार के लिए स्थायी जगह मिल जाती है, तो वे सार्वजनिक गणेशोत्सव आयोजित कर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करेंगे।
समुदाय की यह इच्छा धीरे-धीरे पूरी होने लगी। स्थानीय लोगों और नेताओं ने बाजार के लिए उपयुक्त जगह तलाशने का प्रयास किया।
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : रजाबाई तैयबअली ने दी बाजार के लिए जमीन
इन प्रयासों के दौरान जमीन की मालकिन रजाबाई तैयबअली ने बाजार के लिए जमीन उपलब्ध कराने पर सहमति जताई। इसके बाद विस्थापित व्यापारियों को अपना कारोबार दोबारा शुरू करने के लिए जगह मिली।
अपने संकल्प के अनुसार समुदाय ने 12 सितंबर 1934 को नए बाजार के एक हिस्से में भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की। यही स्थापना आगे चलकर लालबागचा राजा की पहचान बनी।
इसलिए लालबागचा राजा की शुरुआत केवल धार्मिक आयोजन के तौर पर नहीं हुई थी। इसके पीछे स्थानीय लोगों की आजीविका, संघर्ष और भगवान गणेश के प्रति उनकी आस्था की कहानी भी जुड़ी हुई है।
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : कैसी थी लालबागचा राजा की पहली मूर्ति?
आज लालबागचा राजा की भव्य प्रतिमा जिस स्वरूप में दिखाई देती है, शुरुआती मूर्ति उससे काफी अलग थी। 1934 में स्थापित प्रतिमा अपेक्षाकृत छोटी और मिट्टी से बनी थी।
मूर्ति को कोली मछुआरा समुदाय की पारंपरिक वेशभूषा के अनुरूप सजाया गया था। धोती और टोपी जैसे पारंपरिक परिधान इसके स्वरूप का हिस्सा थे। साधारण रूप में स्थापित यह प्रतिमा उस समय के स्थानीय कामकाजी समुदाय से गहरे जुड़ाव को दर्शाती थी।
Mumbai Ganesh Chaturthi 2026 : 1935 से कांबली परिवार ने संभाली मूर्ति बनाने की परंपरा
लालबागचा राजा की मूर्ति निर्माण की परंपरा अगले ही वर्ष यानी 1935 में कांबली परिवार से जुड़ गई। बताया जाता है कि उस साल मधुसूदन कांबली ने मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी संभाली थी।
इसके बाद कांबली परिवार की कई पीढ़ियों ने लालबागचा राजा की प्रतिमा को आकार देने की परंपरा को आगे बढ़ाया। करीब नौ दशक से अधिक समय से यह परिवार इस परंपरा से जुड़ा हुआ है। आज लालबागचा राजा मुंबई के सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक गणेशोत्सवों में शामिल है। इसकी लोकप्रियता के पीछे सिर्फ भव्यता नहीं, बल्कि करीब नौ दशक पुरानी आस्था, संघर्ष और सामुदायिक एकजुटता की कहानी भी है।
गणेश उत्सव की शुरुआत केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय एकता के माध्यम के रूप में भी हुई। महाराष्ट्र में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेश उत्सव को व्यापक स्वरूप दिया। उनका उद्देश्य था कि समाज के अलग-अलग वर्ग एक मंच पर आएं और सामूहिक चेतना मजबूत हो। उस दौर में सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर कई तरह की पाबंदियां थीं, ऐसे में गणेश उत्सव ने लोगों को एकजुट होने का अवसर दिया।
समय के साथ यह उत्सव धार्मिक आस्था से आगे बढ़कर सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सेवा का माध्यम बन गया। आज देश के अलग-अलग हिस्सों में गणेश उत्सव मनाया जाता है। हालांकि भव्यता और आयोजनों के बीच हमें इसके मूल भाव को नहीं भूलना चाहिए—एकता, सद्भाव, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी। यही गणेश उत्सव की वास्तविक शक्ति और सार्थकता है।
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