Sarkari Office : भाइयों और उनकी बहनों, अगर आपको अपनी सहनशीलता (Patience) नापनी हो, तो किसी लेबोरेटरी में जाने की जरूरत नहीं है। बस एक छोटा सा सरकारी कागज बनवाने अपने नजदीकी सरकारी दफ्तर चले जाइए। कसम से, वहां जाने के बाद आपको लगेगा कि मोक्ष प्राप्त करना आसान है, लेकिन एक अदद ‘मूल निवासी प्रमाण पत्र’ पर दस्तखत करवाना, कलयुग का सबसे बड़ा भगीरथ प्रयास है।
सरकारी दफ्तर में कदम रखते ही जो सबसे पहला दिव्य वाक्य आपके कानों में गूंजता है, वह संगीत की धुन की तरह अमर हो चुका है, “काउंटर नंबर 4 पर जाइए!
आप अपनी चप्पलें घिसते हुए, उम्मीद का झोला लटकाए काउंटर नंबर 4 पर पहुंचते हैं। वहां बैठे बाबू साहब आपको ऐसे देखते हैं जैसे आप उनसे उनकी जायदाद का हिस्सा मांगने आए हों। आप सहमते हुए कहते हैं, “सर, ये फॉर्म जमा करना था।” बाबू साहब बिना आपकी तरफ देखे, फाइल पलटते हुए कहेंगे, “ये फॉर्म यहाँ जमा नहीं होगा, इसके लिए काउंटर नंबर 2 से टोकन लाइए, फिर 5 नंबर वाले बाबू से साइन कराइए, और हाँ… अभी तो लंच का टाइम हो गया है, लंच के बाद आना!
Sarkari Office : द ग्रेट ‘लंच टाइम’ का रहस्य
सरकारी दफ्तरों का ‘लंच टाइम’ दुनिया का आठवां अजूबा है। यह घड़ी देखकर नहीं शुरू होता, यह बाबू साहब के मूड से शुरू होता है। सरकारी घड़ी में भले ही दोपहर के 1:30 बजे हों, लेकिन बाबू साहब का टिफ़िन अगर 12:45 पर खुल गया, तो वहीं से ‘लंच काल’ की घोषणा हो जाती है।
इस लंच की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कब शुरू होता है, यह सबको पता होता है, लेकिन यह कब खत्म होगा… यह खुद ब्रह्मा जी भी नहीं बता सकते। आप बाहर धूप में खड़े होकर इंतजार कर रहे हैं, और अंदर बाबू साहब दाल-चावल का लुत्फ लेते हुए देश की राजनीति और क्रिकेट पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं। आपके जीवन का सबसे बड़ा संकट उनके लिए सिर्फ एक ‘कागज का टुकड़ा’ है।
Sarkari Office : साहब सीट पर नहीं हैं
चलिए, मान लेते हैं कि आपने लंच खत्म होने का इंतजार कर लिया। आपकी तपस्या रंग लाई और आप दोबारा काउंटर पर पहुंचे। अब आपको एक नया और ज्यादा खतरनाक डायलॉग सुनने को मिलता है, “साहब अभी सीट पर नहीं हैं!”
यह ‘सीट’ भी बड़ी मायावी चीज है। साहब पूरे दफ्तर में हर जगह पाए जाएंगे, चाय की टपरी पर, बगल वाले कमरे में गप्पें मारते हुए, या फिर गैलरी में पान चबाते हुए। लेकिन वो कहाँ नहीं मिलेंगे? अपनी खुद की सीट पर ! साहब की कुर्सी पर हमेशा एक तौलिया लटका रहता है, जो इस बात का प्रतीक है कि साहब का ‘अस्तित्व’ दफ्तर में कहीं न कहीं मौजूद है, पर वो आपको मिलेंगे नहीं।

यदि आपने गलती से पूछ लिया, “सर, साहब कब तक आएंगे?” तो बगल की सीट से जवाब आएगा, “अब सीधे मीटिंग के बाद ही आएंगे, या कल सुबह आना।” कल सुबह जब आप जाएंगे, तो पता चलेगा कि साहब आज ‘आकस्मिक अवकाश’ (Casual Leave) पर हैं।
Sarkari Office : लालफीताशाही का ‘हथौड़ा’
सरकारी दफ्तरों का एक और अचूक नियम है ‘दस्तावेजों की अनंत भूख’। आप आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, दसवीं की मार्कशीट, दादाजी का मृत्यु प्रमाण पत्र और पड़ोस के कुत्ते का बर्थ सर्टिफिकेट… सब लेकर चले जाइए। लेकिन जैसे ही आप फाइल आगे बढ़ाएंगे, बाबू साहब चश्मा नाक पर टिकाकर बोलेंगे “अरे भाई! इसमें वार्ड पार्षद की वो वाली मुहर कहाँ है, जो नीली स्याही से लगती है? और इस पर फोटो अटेस्टेड कहाँ है?
Sarkari Office : आप कहेंगे, “सर, बाकी सब तो असली है ना?”
जवाब मिलेगा, “नियम तो नियम है भाई, ऊपर से ऑर्डर है। जाओ, पहले मुहर लगवा कर लाओ।”
यहाँ इंसान कागजों में जिंदा रहता है और कागजों में ही मर जाता है। जब तक आपकी फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल पर सरकती है, तब तक फाइल का रंग पीला और आपके बालों का रंग सफेद हो चुका होता है। फाइल को ‘पहिए’ लगाने की कला जिसे आ गई, उसका काम मिनटों में हो जाता है, और जो नियम-कायदों के भरोसे रहा, वह दफ्तर के बरामदे का स्थायी निवासी बन जाता है।
Sarkari Office तो दोस्तों, सरकारी दफ्तर दरअसल हमें जिंदगी का सबसे बड़ा फलसफा सिखाते हैं, “धैर्य ही जीवन है।” यह वो जगह है जहाँ आकर ‘टाइम मैनेजमेंट’ के सारे विदेशी सिद्धांत दम तोड़ देते हैं।
इसलिए, अगली बार जब भी सरकारी दफ्तर जाएं, तो घर से पानी की बोतल, थोड़ा नाश्ता और एक मोटी चादर साथ लेकर जाएं। क्योंकि साहब कब सीट पर आएंगे और लंच कब खत्म होगा, इसका इंतजार करते-करते कहीं आपकी अगली पीढ़ी जवान न हो जाए!
ठोकिए इस लालफीताशाही पर हास्य का हथौड़ा, और कहिए, अगली बार…लंच के बाद ही आएंगे !

