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Pulwama attack : पुलवामा की 7वीं बरसी: यादों में जिंदा हैं शहीद पंकज त्रिपाठी, बच्चे आज भी पिता के लौटने की जोह रहे राह

Pulwama attack

Pulwama attack : 14 फरवरी 2019 का वह काला दिन, जिसने देश को गहरे जख्म दिए, उत्तर प्रदेश के महाराजगंज के त्रिपाठी परिवार के लिए एक कभी न खत्म होने वाला इंतजार बन गया। पुलवामा हमले में शहीद हुए 40 जांबाजों में से एक, कांस्टेबल पंकज त्रिपाठी की शहादत को आज 7 साल बीत चुके हैं। तिरंगे में लिपटकर जब पंकज घर आए थे, तब उनका परिवार बिखर सा गया था, लेकिन उनकी यादें और उनके भाई का हौसला आज भी उस बलिदान की लौ को जलाए हुए है।

शहादत के बाद परिवार का संघर्ष और अपनों को खोने का दर्द

Pulwama attack पंकज त्रिपाठी की शहादत का गहरा असर उनके माता-पिता पर पड़ा। पंकज के छोटे भाई शुभम त्रिपाठी ने बताया कि बड़े भाई के जाने का गम उनकी मां सहन नहीं कर पाईं। बेटे की शहादत के एक साल बाद ही ब्रेन हैमरेज के कारण उनका निधन हो गया। पिता, जो पहले से ही हृदय रोगी हैं, आज भी उस कमी को महसूस करते हैं। शुभम बताते हैं कि भाई के जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई, जिसके कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और परिवार के भरण-पोषण के लिए कंस्ट्रक्शन के काम में जुटना पड़ा।

पिता की ‘ड्यूटी’ और बच्चों का मासूम इंतजार

Pulwama attack शहीद पंकज त्रिपाठी अपने पीछे दो मासूम बच्चे छोड़ गए थे। उनका बेटा अब 10 साल का हो चुका है, जबकि उनकी बेटी, जो शहादत के वक्त गर्भ में थी, अब 7 साल की है। शुभम कहते हैं, “बच्चे अक्सर पूछते हैं कि पापा कब आएंगे, तो हम उन्हें बस यही कहकर दिलासा देते हैं कि पापा अभी ड्यूटी पर तैनात हैं।” ताज्जुब की बात यह है कि अपने पिता को न देख पाने के बावजूद, दोनों बच्चों की आंखों में वही चमक है जो पंकज में थी—दोनों ही बड़े होकर सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते हैं।

स्मृति और सम्मान: सरकार की पहल और अंतिम विदाई के शब्द

Pulwama attack पंकज त्रिपाठी ने जाते समय अपने भाई से कहा था, “मैं जा रहा हूं, अब पूरे परिवार की जिम्मेदारी तुम्हारी है।” आज सरकार ने उनके सम्मान में गांव के स्कूल, अमृत सरोवर और हाईवे पर तोरण द्वार का नाम शहीद पंकज त्रिपाठी के नाम पर रखा है। उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी मिल चुकी है, जिससे परिवार को आर्थिक संबल मिला है। हर साल 14 फरवरी को उनकी याद में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया जाता है, जहां जिले के अधिकारी और आम जनता इस शूरवीर को नमन करने पहुंचती है।

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