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कैसे बनी भारत की पहली मिसाइल ‘पृथ्वी’?

concept&Writer: Yoganand Shrivastva

साल 1980 की शुरुआत थी और भारत एक नए युग में कदम रखने वाला था। देश रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था, लेकिन उसके पास था एक सपना—आत्मनिर्भर बनना और अपनी रक्षा के लिए अपने हाथों से तकनीक विकसित करना। इसी समय दो महान वैज्ञानिक, डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम और डॉक्टर वीएस अरुणाचलम, भारत की पहली प्राइमरी मिसाइल बनाने का साहसिक विचार लेकर बैठे। उनके सामने चुनौती बड़ी थी—देश के पास संसाधन सीमित थे, तकनीकी ज्ञान सीमित था, और समय बहुत कम था। लेकिन उनके अंदर जो जज्बा था, वह किसी भी कठिनाई से हार मानने वाला नहीं था। उनके पास 400 करोड़ रुपये चाहिए थे, लेकिन जानते थे कि इतना बड़ा बजट आसानी से नहीं मिलेगा। इसलिए उन्होंने हर संभावित बजट पर योजना बनाई—अगर 100 करोड़ मिले तो क्या करेंगे, अगर 200 करोड़ मिले तो क्या करेंगे, अगर सिर्फ आधे पैसे भी मिले तो मिशन कैसे आगे बढ़ेगा।

उनके दिमाग में एक भी क्षण नहीं आया कि प्रोजेक्ट को छोड़ दिया जाए, क्योंकि यह केवल एक मिसाइल नहीं थी, बल्कि भारत के भविष्य का सवाल था। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर छोटे-छोटे प्रयोग शुरू किए। रॉकेट के इंजन को बार-बार टेस्ट किया गया, डिजाइन को बार-बार बदलते हुए नए सिरे से बनाना पड़ा, और कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। कभी-कभी इंजन फट जाते, कभी मिसाइल निर्धारित दूरी तक नहीं पहुंचती, लेकिन डॉक्टर कलाम और अरुणाचलम हर असफलता से सीखते और अगली योजना पर काम शुरू कर देते। उनके साथियों की टीम ने दिन-रात मेहनत की, हर समस्या का समाधान मिलकर खोजा गया और हर निर्णय में वैज्ञानिक सोच के साथ देशभक्ति का जज्बा जुड़ा। 1985 तक कई कठिनाइयों के बावजूद मिशन ने गति पकड़ी। तकनीकी चुनौतियों के साथ-साथ राजनीतिक दबाव भी था, क्योंकि देश के संसाधनों को लेकर आलोचना होती थी और बजट कम मिलने की संभावना बनी रहती थी। लेकिन डॉक्टर कलाम और उनकी टीम ने हर बाधा को पार किया। उन्होंने न केवल तकनीकी रूप से अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया बल्कि टीम के हर सदस्य को महत्व दिया। छोटे इंजीनियर से लेकर वरिष्ठ वैज्ञानिक तक, हर किसी के विचार को महत्व दिया गया और हर समस्या का हल सामूहिक रूप से खोजा गया। इसके अलावा, उन्होंने सुरक्षा और गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा, क्योंकि यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा से जुड़ा था। कई बार परीक्षणों के दौरान रॉकेट को लाने-ले जाने में समस्या आती, लेकिन टीम ने धैर्य और बुद्धिमानी से हर स्थिति का समाधान निकाला।

इसी मेहनत और लगन का परिणाम था कि 1988 में भारत की पहली प्राइमरी मिसाइल ‘पृथ्वी’ तैयार हो गई। यह मिसाइल केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक क्षमताओं का प्रतीक बन गई। जब पहली बार ‘पृथ्वी’ को लॉन्च किया गया, तो पूरे DRDO परिसर में खुशी की लहर दौड़ गई। यह दिन केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का दिन था। पाँच साल बाद, इस सफलता का सम्मान संसद में भी हुआ। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सदन में खड़े होकर भारत की इस उपलब्धि का जिक्र किया और कहा कि अब भारत तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बन रहा है। डॉक्टर कलाम और डॉक्टर अरुणाचलम की मेहनत ने यह साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी अगर लगन, टीमवर्क और देशभक्ति का जज्बा हो, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं है। ‘पृथ्वी’ मिसाइल ने न केवल रक्षा के क्षेत्र में भारत को मजबूत किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रेरित किया। यह कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे बजट की कमी, तकनीकी चुनौतियाँ और राजनीतिक दबाव भी किसी मजबूत संकल्प को रोक नहीं सकते। डॉक्टर कलाम ने हमेशा कहा—“सपने वो नहीं जो हम सोते वक्त देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।” और ‘पृथ्वी’ मिसाइल इस कथन का जीता जागता उदाहरण बन गई। यह केवल मिसाइल नहीं थी, बल्कि एक प्रेरणा थी उन सभी वैज्ञानिकों के लिए, जो कठिन परिस्थितियों में भी देश के लिए कुछ बड़ा करना चाहते हैं। इस मिशन ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दी और देशवासियों में यह विश्वास पैदा किया कि भारत हर क्षेत्र में अग्रणी बन सकता है। मिसाइल का इतिहास आज भी प्रेरणा देता है—क्योंकि यह दिखाता है कि अगर चाह हो, लगन हो और देशभक्ति का जज्बा हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। ‘पृथ्वी’ की कहानी आज भी हमें सिखाती है कि असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें सीख का अवसर समझकर आगे बढ़ना चाहिए।

इसी कहानी से पता चलता है कि भारत के वैज्ञानिक और इंजीनियर कितने धैर्यवान, मेहनती और निडर हैं। उन्होंने सीमित संसाधनों में भी जो उपलब्धि हासिल की, वह न केवल देश के लिए गर्व का कारण बनी, बल्कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी नए मानक स्थापित किए। ‘पृथ्वी’ मिसाइल का विकास यह साबित करता है कि किसी भी देश की ताकत केवल उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के जज्बे और मेहनत में है। इस कहानी से हर युवा वैज्ञानिक, इंजीनियर और छात्र यह सीख सकता है कि असफलता और बाधाएँ केवल सीखने का माध्यम हैं, और अगर संकल्प मजबूत हो, तो किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। ‘पृथ्वी’ मिसाइल आज भी भारत के वैज्ञानिक इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में से एक मानी जाती है।

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