Sushmita Dev : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पार्टी को एक और बड़ा झटका लगा है। राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने के साथ-साथ राज्यसभा सदस्यता भी छोड़ दी है। इस सप्ताह पार्टी छोड़ने वाली वह दूसरी राज्यसभा सांसद बन गई हैं।
सुष्मिता देव ने राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा स्वीकार करने का अनुरोध किया। उनके इस्तीफे के कुछ ही समय बाद असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma के साथ उनकी एक तस्वीर सामने आई, जिसने उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलों का बाजार गर्म कर दिया।

हालांकि मीडिया से बातचीत में सुष्मिता देव ने केवल इतना कहा कि उनकी मुलाकात का संबंध असम से है। उन्होंने किसी नई राजनीतिक पारी को लेकर स्पष्ट संकेत नहीं दिए।
सुष्मिता देव 2021 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुई थीं। उस समय उन्होंने इसे जनसेवा के एक नए अध्याय की शुरुआत बताया था। वह असम के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री Santosh Mohan Dev की पुत्री हैं। कांग्रेस में रहते हुए वह All India Mahila Congress की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
इससे पहले वह असम के सिलचर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, जिसे उनके परिवार का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है।
Sushmita Dev : पहले भी छोड़ चुके हैं वरिष्ठ नेता
सुष्मिता देव से पहले तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद Sukhendu Sekhar Ray ने भी पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा देते समय उन्होंने पार्टी नेतृत्व और पश्चिम बंगाल में पिछले वर्षों के शासन को लेकर तीखी टिप्पणी की थी।

Sushmita Dev : पार्टी के भीतर बढ़ रही है असंतोष की लहर
तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौतियां केवल सांसदों के इस्तीफे तक सीमित नहीं हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के कई विधायकों ने नेतृत्व के आधिकारिक रुख से अलग जाकर विपक्ष के नेता के चुनाव में अलग मत व्यक्त किया था। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और गुटबाजी को उजागर कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में झटका मिलने के बाद पार्टी संगठन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। लगातार हो रहे इस्तीफों और आंतरिक असहमति ने तृणमूल कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
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अब सभी की नजरें सुष्मिता देव के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं। असम के मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि वह जल्द ही किसी नए राजनीतिक मंच के साथ अपनी अगली पारी शुरू कर सकती हैं।
आपको बता दें कि तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें केवल सांसदों के इस्तीफों तक सीमित नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर असंतोष इतना बढ़ गया है कि टीएमसी के 20 सांसदों ने भी लोकसभा स्पीकर को अलग समूह के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र सौंपा था। इस घटनाक्रम ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है और संकेत दिए हैं कि संगठन के भीतर मतभेद गहराते जा रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हालिया विधानसभा चुनाव में झटका लगने के बाद पार्टी के कई नेता और जनप्रतिनिधि नेतृत्व की कार्यशैली से असहमत नजर आ रहे हैं। सांसदों द्वारा अलग पहचान की मांग और लगातार हो रहे इस्तीफों ने तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक संकट खड़ा कर दिया है।
Sushmita Dev : संपादकीय नजरिया
तृणमूल कांग्रेस के लिए हाल के घटनाक्रम चिंता बढ़ाने वाले हैं। राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बाद पार्टी के कुछ सांसदों द्वारा अलग मान्यता की मांग किए जाने की खबरें संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष की ओर इशारा करती हैं। चुनावी हार के बाद किसी भी दल में आत्ममंथन स्वाभाविक है, लेकिन जब मतभेद सार्वजनिक होने लगें तो नेतृत्व को गंभीरता से स्थिति का आकलन करना चाहिए।
सुष्मिता देव का पार्टी छोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पूर्वोत्तर में टीएमसी का प्रमुख चेहरा थीं। वहीं, सांसदों और विधायकों के बीच उभर रही असहमति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या पार्टी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखने में असफल रही है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की है। यदि समय रहते असंतोष को नहीं संभाला गया, तो इसका असर केवल पार्टी ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
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