concept&Writer: Yoganand Shrivastva
कहानी शुरू होती है सोलहवीं सदी के आखिर में, हिंदुस्तान के पश्चिमी तट पर बसे एक छोटे से प्रदेश—गोवा—से। तब यह इलाका पुर्तगालियों के कब्जे में था। वहीं, साल 1756 में कैंडोलिम नाम के गांव में एक बच्चे ने जन्म लिया, नाम रखा गया—जोसे कुस्तोदियो दे फारिया (José Custódio de Faria), जिसे बाद में पूरी दुनिया ने ऐबे फारिया (Abbé Faria) के नाम से जाना। पिता एक विद्वान और पादरी थे, जिनका झुकाव पुर्तगाली दरबार और धर्म की राजनीति की तरफ था। मां एक धार्मिक महिला थीं, जिनकी आंखों में अपने बेटे के लिए एक ‘फादर’ बनने का सपना था। पर खुद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था—क्योंकि ये वही लड़का था जो आगे चलकर पूरी दुनिया को बताएगा कि “सम्मोहन कोई जादू नहीं, बल्कि दिमाग की शक्ति है।”

बचपन में फारिया बेहद जिज्ञासु थे। गोवा की शांत गलियों, नारियल के पेड़ों और समुद्र की लहरों के बीच वो हर चीज़ को बड़े गौर से देखते। पुर्तगालियों की हुकूमत में उन्हें धार्मिक शिक्षा मिली, पर उनका मन दार्शनिक सवालों में भटकता रहता था—“मनुष्य क्या सोचता है?”, “क्यों डरता है?”, “क्यों मान लेता है कि कोई उसे नियंत्रित कर सकता है?”। पिता ने जब देखा कि लड़का तेज है, तो उसे पुर्तगाल भेज दिया गया, जहां आगे चलकर उसने धर्म, दर्शन और मनोविज्ञान की पढ़ाई की। वहीं से शुरू हुआ उसका सफर—गोवा के छोटे से गांव से यूरोप के शाही दरबारों तक।
यूरोप में उस वक्त ‘मेस्मेरिज्म’ का दौर था। जर्मनी के डॉक्टर फ्रांज एंटन मेस्मर (Franz Anton Mesmer) ने यह थ्योरी दी थी कि हर जीव में एक अदृश्य “एनिमल मैग्नेटिज़्म” नाम की शक्ति होती है। उसी शक्ति को नियंत्रित करके इंसान को सम्मोहन की अवस्था में लाया जा सकता है। मेस्मर का दावा था कि वो इस “चुंबकीय ऊर्जा” के ज़रिए मरीजों को ठीक कर सकता है। यूरोप के शाही लोग उनके पीछे पागल थे, पर कई वैज्ञानिकों को यह धोखा लगता था। तभी एक दिन, फारिया ने यह सब देखा और समझा कि इस कहानी में कुछ गड़बड़ है। उन्होंने महसूस किया कि जब कोई व्यक्ति “सम्मोहित” होता है, तो असल में कोई अदृश्य शक्ति नहीं चल रही होती—बल्कि वो खुद अपनी कल्पना और विश्वास के ज़रिए उस स्थिति में चला जाता है। यानी जादू या “एनिमल मैग्नेटिज्म” नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की स्वयं की शक्ति ही सम्मोहन की जड़ है।
कहानी यहीं नहीं रुकी। फ्रांसीसी क्रांति के दिनों में फारिया ने राजनीति में भी कदम रखा। वो पुर्तगाल से पेरिस आ गए, जहां उन्होंने क्रांतिकारियों का साथ दिया। इस कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया। कहते हैं, जेल की अंधेरी कोठरी में बैठकर फारिया ने पहली बार यह अनुभव किया कि जब वह अपने मन को शांत करते हैं, तो डर, दर्द और बेचैनी सब गायब हो जाते हैं। उन्होंने ध्यान दिया कि अगर वो खुद को कहें कि “मुझे दर्द नहीं है”, तो शरीर उस आदेश को मान लेता है। यहीं से उनके जीवन की सबसे बड़ी खोज हुई—सम्मोहन कोई बाहरी ताकत नहीं, बल्कि विश्वास और कल्पना का खेल है।

जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने पेरिस में लेक्चर देने शुरू किए। उनके व्याख्यान में वैज्ञानिक, दार्शनिक और चिकित्सक शामिल होते थे। वह मंच पर खड़े होकर किसी व्यक्ति को बुलाते और कहते—“सो जाओ!” और कुछ सेकंड में वह व्यक्ति अर्धनिद्रा की अवस्था में चला जाता। पूरा हॉल हैरान रह जाता। लेकिन जब लोग उनसे पूछते कि आपने यह कैसे किया? तो फारिया मुस्कराते और कहते—“मैंने कुछ नहीं किया, उसने खुद किया। मैंने सिर्फ उसे यह विश्वास दिलाया कि वो सो जाएगा।” यही फारिया का जादू था—सम्मोहन को उन्होंने रहस्य नहीं, विज्ञान में बदल दिया।
ऐबे फारिया ने अपनी पूरी जिंदगी इस सिद्धांत पर रिसर्च की। उन्होंने कहा—“हिप्नॉटिज्म इज़ नॉट मैजिक, इट इज़ इमैजिनेशन कंट्रोल्ड बाय विल.” यानी “सम्मोहन कोई जादू नहीं, बल्कि इच्छा शक्ति द्वारा नियंत्रित कल्पना है।” उस समय जब यूरोप में ज्यादातर लोग ‘जादू’ और ‘चमत्कार’ में विश्वास करते थे, फारिया ने यह कहकर सबका नजरिया बदल दिया। उन्होंने बताया कि कोई भी व्यक्ति अगर चाहे, तो खुद को सम्मोहित कर सकता है, खुद को शांत कर सकता है, अपने दर्द को घटा सकता है। उन्होंने इसका इस्तेमाल मानसिक उपचार के तौर पर सुझाया। धीरे-धीरे उनके विचार मनोविज्ञान की मुख्य धारा में शामिल हो गए।
हालांकि फारिया का जीवन आसान नहीं था। कई वैज्ञानिकों और धर्मगुरुओं ने उन्हें ठग कहा। पादरियों ने तो यहां तक कह दिया कि वो “ईश्वर की शक्ति का अपमान” कर रहे हैं। लेकिन फारिया डटे रहे। उन्होंने अपना शोध जारी रखा और “De la Cause du Sommeil Lucide” नामक किताब लिखी—जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे सम्मोहन मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क पर असर डालता है। उन्होंने साबित किया कि यह किसी चुंबकीय तरंग या आत्मिक शक्ति से नहीं, बल्कि मानव मन की सहमति से होता है।
यूरोप के डॉक्टरों ने धीरे-धीरे फारिया की थ्योरी को अपनाना शुरू किया। हिप्नॉटिज्म को अब मानसिक चिकित्सा का हिस्सा माना जाने लगा। आगे चलकर सिगमंड फ्रायड ने भी अपने मनोविश्लेषण सिद्धांतों में फारिया की खोजों को आधार बनाया। आज जो हिप्नोथेरेपी (Hypnotherapy) या माइंड प्रोग्रामिंग जैसी तकनीकें हैं, उनकी नींव फारिया की सोच में छिपी है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फारिया के अपने देश—भारत—में उन्हें शायद ही कोई जानता था। गोवा का यह लड़का, जो यूरोप में “Father of Scientific Hypnotism” कहलाया, अपने ही देश में गुमनाम रहा। 1819 में पेरिस में एक छोटे से कमरे में उनकी मौत हुई। उनके अंतिम संस्कार में कुछ ही लोग शामिल हुए, लेकिन उनके विचार मरने के बाद भी जिंदा रहे।
उनके बारे में एक किस्सा मशहूर है—एक बार उन्होंने अपने शिष्य को कहा, “मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका डर है, और सम्मोहन उस डर को पहचानने की कला है।” यही वजह थी कि बाद में जब मशहूर लेखक अलेक्जेंडर ड्यूमा ने अपनी अमर रचना “The Count of Monte Cristo” लिखी, तो उसमें एक किरदार था—अब्बे फारिया—जो जेल में बंद होकर अपने साथी को ज्ञान और हिम्मत देता है। वह किरदार असल में इसी गोवा के पादरी पर आधारित था।
आज भी जब कोई मनोवैज्ञानिक मरीज को रिलैक्स कराने, उसके अवचेतन मन तक पहुंचने या उसकी चिंता को कम करने के लिए सम्मोहन का प्रयोग करता है, तो वहां कहीं न कहीं ऐबे फारिया का दर्शन जीवित है। उन्होंने दिखाया कि हमारे भीतर इतनी शक्ति है कि हम खुद अपने विचारों को बदल सकते हैं, अपनी पीड़ा को कम कर सकते हैं और अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं।
गोवा के उस छोटे से गांव में जन्मा वह बच्चा, जो कभी समुद्र किनारे बैठकर लहरों को देखता था, उसने पूरी दुनिया को सिखाया कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका मन है। ऐबे फारिया ने साबित किया कि सम्मोहन कोई रहस्य नहीं, बल्कि आत्म-विश्वास की अंतिम सीमा है। और शायद इसलिए आज भी विज्ञान की दुनिया में जब हिप्नॉटिज्म की बात होती है, तो एक नाम हमेशा गूंजता है—“गोवा का लड़का, जिसने दुनिया को अपने दिमाग की ताकत दिखा दी।”





