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धनतेरस क्यों मनाई जाती है – पूरी कहानी और महत्व

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धनतेरस, जिसे ‘धनत्रयोदशी’ भी कहा जाता है, दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। यह कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है और मुख्य रूप से धन, समृद्धि, आरोग्य और सौभाग्य के लिए मनाया जाता है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी लोगों के जीवन में अपनी खास जगह रखता है। धनतेरस की परंपरा के पीछे कई पुरानी कथाएँ और धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है समुद्र मंथन की कथा। समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था, और इस मंथन से कई रत्न और दिव्य वस्तुएँ उत्पन्न हुईं। इनमें से एक थे भगवान धन्वंतरि, जो अमृत कलश के साथ प्रकट हुए। उन्हें आयुर्वेद का देवता और प्रथम वैद्य माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से न केवल स्वास्थ्य में सुधार होता है बल्कि जीवन में दीर्घायु, आरोग्य और समृद्धि आती है।

इसी कारण इस दिन को ‘धन्वंतरि जयंती’ भी कहा जाता है और लोग इस दिन विशेष रूप से उनके सम्मान और आशीर्वाद के लिए पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त, धनतेरस से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण कथा राजा हिमा और उनके पुत्र की है। कथा के अनुसार, राजा हिमा का पुत्र अपनी शादी के चौथे दिन ही मृत्यु के मार्ग पर था, और भविष्यवाणी हुई थी कि उसकी मृत्यु सर्पदंश से होगी। जब वह दिन आया, तब उसकी पत्नी ने घर को दीपों और सोने-चाँदी के आभूषणों से सजाया। उसने कमरे के चारों ओर दीपक जला दिए और पूरी जगह को उजागर कर दिया। यमराज सर्प के रूप में आए और उस तेज रोशनी से उनकी दृष्टि बाधित हो गई, जिससे वे कमरे में प्रवेश नहीं कर पाए और बाहर बैठकर रातभर उसकी कहानियाँ और गाने सुनते रहे। सुबह होते ही यमराज लौट गए और इस प्रकार उस युवक की मृत्यु टल गई। इस कथा से यह परंपरा उत्पन्न हुई कि इस दिन सोना-चाँदी खरीदना, दीप जलाना और लक्ष्मी-यम दीपदान करना शुभ माना जाता है, ताकि घर में धन, सौभाग्य और समृद्धि बनी रहे। इसके साथ ही इस दिन लक्ष्मी पूजन का भी विशेष महत्व है। लोग देवी लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन यदि नए बर्तन, सोने या चाँदी की चीज़ें खरीदी जाएँ तो घर में समृद्धि आती है और देवी लक्ष्मी का वास होता है। शाम को घर की सफाई कर दीपक जलाना और घर के मुख्य द्वार पर दीपक सजाना आवश्यक माना जाता है, ताकि सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़े और धन, स्वास्थ्य एवं खुशहाली बनी रहे। इस दिन कई प्रमुख कर्म किए जाते हैं जैसे नए बर्तन, सोने-चाँदी की खरीदारी, घर को साफ करके दीपक जलाना, यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाना जिसे यमदीपदान कहा जाता है, भगवान धन्वंतरि की पूजा कर स्वास्थ्य की कामना करना और लक्ष्मी-कुबेर पूजन द्वारा धन और समृद्धि का आह्वान करना।

धनतेरस केवल खरीदारी का दिन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा पर्व है जो लोगों के जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि, दीर्घायु और सौभाग्य की कामना करता है। यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि प्रकाश, श्रद्धा और सत्कर्म से हम अपने जीवन में आने वाले दुर्भाग्य और कठिनाइयों को टाल सकते हैं। इस दिन की परंपराएँ और कथाएँ यह संदेश देती हैं कि ईमानदारी, मेहनत और सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन में हमेशा खुशहाली और सफलता बनी रहती है। इसी तरह, धनतेरस का त्योहार न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परिवार और समाज में मेलजोल, परंपरा और खुशहाली का प्रतीक बनकर सामने आता है। इस दिन का महत्व केवल पूजा और खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन में धन, स्वास्थ्य और सुख-शांति लाने वाला पर्व है। धनतेरस के दिन दीपक जलाने, सोना-चाँदी खरीदने और देवी-देवताओं की पूजा करने की परंपरा यह सिखाती है कि जीवन में भौतिक संपत्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। घर को सजाना, दीपक जलाना, आभूषण खरीदना और धन की देवी की पूजा करना केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन को भी बढ़ाता है। इस प्रकार धनतेरस का पर्व समाज में सकारात्मक ऊर्जा, खुशहाली और धार्मिक जागरूकता फैलाने का कार्य करता है। आज के समय में यह पर्व आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देता है क्योंकि लोग इस दिन सोने-चाँदी, नए बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुएँ खरीदते हैं, जिससे बाजार में उत्साह और व्यापार में वृद्धि होती है। लेकिन मूल रूप से धनतेरस का महत्व धन, स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति में है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में केवल धन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आशीर्वाद भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण से धनतेरस का पर्व भारत में अत्यधिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है और यह दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव की शुरुआत का सबसे शुभ दिन माना जाता है।

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