25 जून 1975: जब एक महिला प्रधानमंत्री ने देश को चुप करवा दिया — लौह महिला या तानाशाह?

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25 जून 1975

25 जून 1975 — वो तारीख, जो भारतीय लोकतंत्र पर हमेशा एक काला धब्बा बनकर रहेगी।

आज ठीक 49 साल हो गए, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने भारत को लोकतंत्र से तानाशाही की ओर धकेल दिया। ये फैसला था — देश में आपातकाल (Emergency) लागू करना।

इंदिरा गांधी को इतिहास में अक्सर लौह महिला कहा जाता है, खासतौर पर उनके विदेश नीति और युद्ध में लिए गए कड़े फैसलों के लिए। लेकिन वहीं दूसरी ओर, 25 जून 1975 का उनका फैसला आज भी यह सवाल छोड़ता है — क्या वह वाकई लौह महिला थीं या लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन?


क्या हुआ था 25 जून 1975 को?

  • रात के अंधेरे में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए।
  • देश में नागरिक स्वतंत्रता, मीडिया की आज़ादी, विपक्ष की आवाज़ — सब कुछ कुचल दिया गया।
  • विपक्षी नेताओं को रातों-रात गिरफ्तार कर लिया गया, जिनमें जेपी नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज शामिल थे।
  • दिल्ली में अखबारों की बिजली काट दी गई ताकि अगली सुबह जनता सच न जान सके।

इंदिरा गांधी का तर्क: देश की सुरक्षा खतरे में थी

इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों का दावा था कि देश में “आंतरिक अशांति” और “बढ़ते विरोध प्रदर्शनों” के चलते हालात बिगड़ रहे थे। उनका कहना था कि ये फैसला देश को स्थिर रखने के लिए लिया गया।

लेकिन क्या सच में ऐसा था?


असल वजह: कुर्सी बचाने की लड़ाई?

25 जून 1975 से कुछ दिन पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था। कोर्ट ने उन्हें भ्रष्ट तरीके अपनाने का दोषी पाया और छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया।

यानी सीधे शब्दों में कहें तो प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में थी।

ऐसे में अचानक देश में आपातकाल लागू कर देना, क्या ये वाकई राष्ट्रहित था? या फिर ये सिर्फ सत्ता बचाने की रणनीति?


संजय गांधी और तानाशाही का दूसरा चेहरा

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का उदय हुआ। उनका रवैया पूरी तरह तानाशाही जैसा था।

  • दिल्ली की झुग्गियों पर बुलडोज़र चलवाए गए।
  • लाखों लोगों की जबरन नसबंदी करवाई गई।
  • विरोध करने वालों को बर्बरता से जेल में डाला गया।

कई मानवाधिकार संगठनों ने उस दौर को भारत का सबसे भयावह समय बताया।


लौह महिला या तानाशाह — बहस आज भी जिंदा है

इंदिरा गांधी ने 1971 में बांग्लादेश युद्ध में ऐतिहासिक जीत दिलाई, पोखरण में परमाणु परीक्षण कराया, विदेश नीति में भारत को मजबूत किया — ये सब उन्हें लौह महिला बनाता है।

लेकिन दूसरी तरफ, 1975 की इमरजेंसी में उन्होंने लोकतंत्र को कुचला, विरोध की हर आवाज़ दबाई — ये उन्हें तानाशाह कहने वालों को भी मजबूत तर्क देता है।


49 साल बाद सवाल अब भी वही हैं

  • क्या देशहित में ऐसा फैसला लेना जायज़ था?
  • अगर कोर्ट ने सजा दी थी तो क्या उसे स्वीकार कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास दिखाना चाहिए था?
  • क्या कोई भी नेता इतना ताकतवर हो सकता है कि वो एक रात में पूरे लोकतंत्र को बंधक बना ले?

निष्कर्ष: इमरजेंसी सिर्फ इतिहास नहीं, चेतावनी भी है

25 जून 1975 सिर्फ एक तारीख नहीं, लोकतंत्र के लिए एक सबक है। एक ऐसा दिन जो बताता है कि अगर जनता सजग न रहे, अगर संस्थाएं कमजोर पड़ जाएं, तो कोई भी सत्ता में बैठा व्यक्ति लोकतंत्र को कुचल सकता है।

आज, 25 जून 2024 को, यह याद रखना ज़रूरी है कि लोकतंत्र एक दिन में नहीं बनता, लेकिन उसे खत्म करने के लिए सिर्फ एक रात ही काफी होती है।


आपकी राय?

क्या आप इंदिरा गांधी को लौह महिला मानते हैं या लोकतंत्र की दुश्मन?
क्या आज का भारत इमरजेंसी से सबक लेकर वाकई मजबूत लोकतंत्र बन पाया है?
अपनी राय कमेंट में जरूर दें।


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