नोबल पुरस्कार पाने की बढ़ी ट्रंप की बेकरारी, ह्वाइट हाउस बोला- कई युद्ध रोकवाने का मिला सम्मान

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नोबल पुरस्कार पाने की बढ़ी ट्रंप की बेकरारी, ह्वाइट हाउस बोला- कई युद्ध रोकवाने का मिला सम्मान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नोबल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा दिन-ब-दिन तेज होती जा रही है। ट्रंप लगातार दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हुए संघर्षों को रोकने का श्रेय अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि कई मामलों में उनके दावे पर सवाल उठ चुके हैं।

ट्रंप का दावा: 24 घंटे में खत्म कर देंगे रूस-यूक्रेन युद्ध

ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान बार-बार दावा किया था कि अगर वह दोबारा राष्ट्रपति बने तो रूस-यूक्रेन युद्ध को 24 घंटे में रोक देंगे। हालांकि, अब तक इस मामले में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है।


व्हाइट हाउस की पैरवी

ह्वाइट हाउस ने भी ट्रंप के लिए नोबल पुरस्कार की मांग को खुलकर समर्थन दिया है।

  • प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया भर में कई संघर्ष खत्म करवाए हैं।
  • उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर को भी ट्रंप की उपलब्धि बताने की कोशिश की।
  • हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में साफ किया कि भारत-पाक संघर्षविराम पाकिस्तान की पहल पर हुआ था, किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं था।

किन देशों के बीच ट्रंप ने युद्ध रोकने का दावा किया?

व्हाइट हाउस के अनुसार, ट्रंप ने अपने छोटे कार्यकाल में औसतन हर महीने एक शांति समझौता या युद्धविराम कराया है।
कैरोलिन लेविट के मुताबिक, ट्रंप ने निम्नलिखित देशों के बीच शांति स्थापित की:

  • थाईलैंड और कंबोडिया
  • इज़राइल और ईरान
  • रवांडा और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
  • सर्बिया और कोसोवो
  • मिस्र और इथियोपिया

मोदी और जयशंकर का बयान

प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों ने ही स्पष्ट किया कि भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम में ट्रंप की कोई भूमिका नहीं थी।

  • मोदी ने संसद में कहा कि किसी भी देश के किसी भी नेता ने भारत से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रोकने के लिए नहीं कहा था।
  • जयशंकर ने भी राज्यसभा में स्पष्ट किया कि 22 अप्रैल से 16 जून तक मोदी और ट्रंप के बीच कोई टेलीफोन बातचीत नहीं हुई थी।

डोनाल्ड ट्रंप की नोबल पुरस्कार पाने की कोशिश अब खुलकर व्हाइट हाउस के समर्थन से जुड़ गई है। लेकिन भारत सहित कई देशों ने उनके दावों को खारिज कर दिया है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनके प्रयास वास्तविक उपलब्धियों पर आधारित हैं या सिर्फ राजनीतिक प्रचार पर।

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