
By : Pramod Shrivastava
Swadesh Ajenda 12 March : बिहार की राजनीति में क्या बड़ा उलटफेर देखने को मिलने वाला है, क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में कदम रख चुके हैं। निशांत की एंट्री पार्टी में उस वक्त हुई है जब नीतीश की पूरी तैयारी राज्यसभा जाने की हैं। और अब निशांत कुमार के राजनीति में आने से नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ाने की अटकलें तेज हैं, निशांत अब जेडीयू के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। पार्टी के कार्यकर्ता और विधायक भी निशांत को नीतीश के बाद अपने नेता के रूप में देखना चाह रहे हैं। दरअसल नीतीश कुमार के नामांकन के बाद जो तस्वीरें देखने को मिली हैं उसने सत्ता के समीकरण की कई सारी परतें उधेड़ कर रख दी।
जैसे नीतीश कुमार की राज्यसभा जाना, और निशांत का पार्टी में आना। नीतीश कुमार की लालू यादव से मुलाकात, निशांत द्वारा तेजस्वी की तारीफ। बिहार और जेडीयू की राजनीति विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी। जेडीयू के कार्यकर्ताओं,विधायकों की निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग। ऐसे और भी कारण है जिनसे बिहार और भाजपा के सारे सियासी समीकरण बदलने की पूरी संभावनाएं हैं। क्योंकि नीतीश कुमार राजनीति की मंझे हुए खिलाड़ी है, सियासत से लेकर सत्ता का खेल बनाने और बिगाड़ने में महिर हैं। बिहार की सत्ता का सिंहासन बीते तीन से चार दशकों से इन्ही के इर्दगिर्द घूमता रहा है। राजनीति के बड़े बड़े धुरंधरों को पानी पिलापिलाकर लाईन से बाहर किया है।

अब जो समीकरण बन रहे हैं उससे क्या भाजपा के मंसबों पर पानी फिर सकता है। बिहार की सत्ता में बदलाव की पटकथा लगभग तैयार मानी जा रही है। नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के तौर पर उनके बेटे निशांत कुमार को आगे बढ़ाया जा रहा है। अगर यह फैसला होता है तो नीतीश कुमार के बाद बिहार और जेडीयू की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होगा। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यदि निशांत को कुर्सी नहीं मिलती है तो फिर नीतीश का अगला कदम क्या होगा। फिलहाल सबकी नजरें नीतीश कुमार और पार्टी नेतृत्व के अगले कदम पर टिकी हैं। बिहार की सत्ता और सियासत को लेकर बीजेपी में भी सन्नाटा पसरा हुआ है। अब सीएम पर सस्पेंश बरकरार है और बिहार में निशांते कुमार।।।। इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे लेकिन पहले ये रिपोर्ट देख लेते हैं।
Swadesh Ajenda 12 March : निशांत को (JDU) विरासत, बदलेगी सियासत ?
बीते लगभग दो दशकों से बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए नीतीश कुमार अब राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं। नीतीश कुमार के इस सियासी फ़ैसले ने कइयों को चौंकाया है, ख़ासकर उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारी के बीच बिहार की राजनीति का तापमान चढ़ा हुआ है। बड़े बदलाव के बीच अटकलों का दौर जारी है, खासतौर पर जो बड़ा सवाल है, वो ये कि नीतीश कुमार के बाद बिहार की कमान आखिर संभालेगा कौन। बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिये कई नामों पर अटकलों का दौर चल रहा है। रेस में कई नाम हैं, संभावनाओं का बाजार गर्म, लेकिन उम्मीदों से इंकार भी नहीं किया जा सकता। उधर बिहार की राजनीति में अंगद की तरह पांव जमाए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही राज्यसभा जाएंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि करीब दो दशक तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर डटे रहने वाले नीतीश क्या इतनी आसानी से मान जाएंगे।
Swadesh Ajenda 12 March : क्या मुख्यमंत्री के नाम पर चलेगी नीतीश की मर्जी ?
दरअसल नीतीश और लालू जैसे नेता जेपी आंदोलन की आग से निकालकर तपे और मंझे हुए राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं। जिन्होंने सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि का फायदा उठाया और मंडल कमीशन की पिछड़ी जाति की राजनीति को बिहार में स्थापित करने का काम किया। यही कारण है कि पिछले 35 सालों में आज तक अगड़ी जाति का कोई भी मुख्यमंत्री बिहार में नहीं बन पाया और बिहार की राजनीति पिछड़े, अति पिछड़ी जाति के भंवर में उलझी रही। अपनी राजनीतिक पारी में नीतीश कुमार बिहार से लेकर देश की राजनीति में बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं। बिहार में मंडल कमंडल की राजनीति को भी पीछे छोड़ते हुए एक नई राजनीति की शुरुआत उन्होंने की। लालू यादव ने जंगल राज के जवाब में नीतीश कुमार ने बिहार की छवि को सुधारने का काम किया। इसलिए सुशासन बाबू भी कहा जाता है। नीतीश कुमार को राजनीतिक हल्कों में कुर्सी कुमार भी कहा जाता है, जो कभी एनडीए के साथ तो कभी महागठबंधन के साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमे रहने वाले पलटूबाज नेता रहे हैं।
Swadesh Ajenda 12 March : बिहार CM के लिये रण, रोचक होते सत्ता के समीकरण
अब नीतीश कुमार ने राज्यसभा का रुख किया है तो जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी बेटे निशांत कुमार के हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी है। निशांत पिछले विधानसभा चुनाव में ही सक्रिय हो चुके थे। लेकिन उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता नहीं ली थी, हालही में वे पार्टी की विधिवत प्राथमिक सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं। नीतीश के साथ ही पार्टी के कार्यकर्ता भी निशांत को अपने नेता के रूप में रूप में देखना चाहते हैं। क्योंकि जेडीयू और बिहार में नीतीश वनमैन आर्मी की भूमिका में रहे हैं। बिहार के विकास पुरूष बने, मॉडल स्टेट के रूप में स्थापित किया। ऐसे में सुशासन की परिपाटी को आगे बढ़ाने के लिये अब बिहार की कमान निशांत के हाथ में हो नीतीश की कोशिश यही है। जिस पर जेडीयू से लेकर अन्य राजनीतिक दलों के अपने अपने रियेक्शन हैं।
बिहार की राजनीति में अगला सीएम कौन होगा, यह बता पाना मुश्किल है। लेकिन विधानसभा चुनाव में नारा दिया गया था, 25 से 30 मुख्यमंत्री नीतीश। लेकिन 26 में ही बिहार की सत्ता के समीकरण बदले हुए हैं। पार्टी के नेता बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही देखना चाहती है। लेकिन विकल्प क्या निशांत कुमार के रूप में होगा। क्योंकि नीतीश के राज्यसभा के नामांकन के दौरान भाजपा हो या जेडीयू दोनों ही दलों के नेताओं का कहना था कि बिहार का मुख्यमंत्री जो भी, वो नीतीश कुमार की मंशा के अनुरूप ही होगा। ऐसे में अब नीतीश की मर्जी से अगला सीएम तय होता है तो क्या उनके बेटे निशांत कुमार पहली पसंद होंगे।
बात यदि बिहार में एनडीए गठबंधन सरकार की करें तो भाजपा भी बिहार में जिसमें जेडीयू घटक दल हैं पार्टी का सीएम बना सकती है। लेकिन ऐसा होता है तो जेडीयू का अंतरविरोध सामने आएगा। ऐसे में नीतीश अपने कार्यकर्ताओं को क्या संदेश देंगे, यह बात देखने वाली होगी। लेकिन यह बात तो तय है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व अक्सर चौंकाने वाला निर्णय लेता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की नजर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व कभी नहीं चाहेगा कि जेडीयू के मामले में वो कोई नया रिस्क उठाए। क्योंकि लोकसभा के चुनाव के पहले केंद्र में स्थिर सरकार होनी चाहिए। निशांत कुमार यदि एनडीए के सीएम नहीं होते हैं तो नीतीश के लिए विकल्प क्या होगा। क्या नीतीश कुमार महागठबंधन का रुख कर सकते हैं। वैसे बिहार की राजनीतिक पेचीदगी को समझ पाना जटिल है। ऐसे में क्या होंगे बिहार की सत्ता के समीकरण ये देखना बहुत ही रोचक होगा।





