BY
Yoganand Shrivastava
New Delhi सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक युग में पति केवल ‘कमाने वाला’ नहीं रह सकता, बल्कि उसे घर की साफ-सफाई, खाना पकाने और कपड़े धोने जैसे रोजमर्रा के कामों में पत्नी का बराबर साथ देना होगा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

New Delhi “समय बदल चुका है”: अदालत ने याद दिलाई जीवन संगिनी की परिभाषा
मामले की सुनवाई के दौरान जब पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी खाना नहीं बनाती और उसका व्यवहार ‘क्रूरता’ की श्रेणी में आता है, तो जस्टिस विक्रम नाथ ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा, “आपको इन सभी कामों में समान रूप से हाथ बंटाना होगा। अब समय बदल चुका है, आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि सारा बोझ पत्नी पर हो।” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि घरेलू काम केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं है।

New Delhi घरेलू सहायिका और पत्नी के बीच का फर्क
न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने इस दौरान एक मार्मिक और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “आपने किसी घरेलू सहायिका (Maid) से शादी नहीं की है, बल्कि एक जीवन संगिनी (Life Partner) से शादी की है।” अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि पति-पत्नी दोनों ही एक सरकारी स्कूल में कार्यरत हैं। कोर्ट का मानना था कि जब दोनों कामकाजी हैं, तो घर की जिम्मेदारी अकेले पत्नी पर थोपना पूरी तरह गलत है।

New Delhi हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती और आगामी सुनवाई
यह पूरा मामला 2017 में हुई एक शादी से जुड़ा है, जहाँ 2019 से दोनों पक्ष अलग रह रहे हैं। निचली अदालत ने क्रूरता के आधार पर तलाक मंजूर किया था, जिसे हाई कोर्ट ने पलट दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से 27 अप्रैल को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। कोर्ट स्वयं दंपति से बात कर मामले की तह तक जाने की कोशिश करेगा।
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