Supreme Court Anticipatory Bail : एक्ट के कथित दुरुपयोग पर बहस, कानून, अधिकार, न्याय का सवाल,सुप्रीम कोर्ट- रिव्यू जरूरी नहीं, चुनौती देने वाली याचिका खारिज
Supreme Court Anticipatory Bail : SC/ST एक्ट…यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने वाला कानून एक बार फिर चर्चा में है। मामला है अग्रिम जमानत के अधिकार का। सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत के प्रावधान को लेकर दायर याचिका पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। कोर्ट ने 2018 के संशोधन और 2020 के फैसले पर दोबारा विचार करने से इनकार किया है। याचिकाकर्ताओं ने एक्ट के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया था। सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट की व्याख्या में पीड़ितों की सुरक्षा और कानून के उद्देश्य को अहम स्थान मिला है। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में, जब प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता या शिकायत दुर्भावनापूर्ण हो, अदालत राहत पर विचार कर सकती है। दरअसल कानून की धारा 18 और 18A के तहत अग्रिम जमानत पर सामान्य रोक का प्रावधान है। यही प्रावधान समय-समय पर कानूनी बहस का केंद्र रहा है। अब एक तरफ सवाल है पीड़ितों को कानूनी सुरक्षा देने का…तो दूसरी ओर आरोपी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का। अब बहस इस बात पर है कि क्या सख्त कानूनी प्रावधानों के साथ जांच और न्यायिक प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं ? क्या कानून का इस्तेमाल पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए प्रभावी तरीके से हो रहा है ? और यदि किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता, तो अदालत की भूमिका क्या होगी ? इन सवालों का जवाब कानून की भाषा, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और प्रत्येक मामले के तथ्यों से तय होता है। ऐसे में सवाल ये कि क्या SC/ST एक्ट में आरोपी के लिए अग्रिम जमानत का रास्ता पूरी तरह बंद है? कानून क्या कहता है और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या का क्या मतलब है ? इसी विषय पर करेंगे चर्चा लेकिन देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट।।।।
Supreme Court Anticipatory Bail : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को SC/ST एक्ट में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। इस संशोधन के तहत SC/ST एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत पर लगी रोक बहाल की गई थी। साथ ही FIR से पहले प्रारंभिक जांच और आरोपी की गिरफ्तारी से पहले मंजूरी की जरूरत भी खत्म कर दी गई थी। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि 2018 के संशोधन को सुप्रीम कोर्ट 2020 में ही बरकरार रख चुका है। बृजभूषण सैनी द्वारा दायर याचिका पर एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील रखी कि SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक उल्टा भेदभाव है। इसलिए इन प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए उस फैसले पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं है। दरअसल…दरअसल साहिल सुसाइड केस में भी साहिल के परिवार का आरोप है कि उनके बेटे को जाति आधारित उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ा। परिवार ने मामले की गहराई से जांच और CBI जांच की मांग की है।बहरहाल अब SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत का मुद्दा केवल जमानत तक सीमित नहीं है। यह सवाल कानून की सख्ती, शिकायतों की जांच और न्यायिक विवेक से भी जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का रुख बताता है कि हर मामले में प्रथम दृष्टया अपराध के तत्वों का परीक्षण महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत पर रोक पूरी तरह सख्त है ? किन परिस्थितियों में आरोपी को राहत मिल सकती है ? और पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा के साथ आरोपी के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनेगा ?
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