Sadanira Samagam : भोपाल में आयोजित हुई विशेष चित्रांकन कार्यशाला
Sadanira Samagam : भोपाल में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग अंतर्गत वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सदानीरा समागम के तहत एक विशेष चित्रांकन कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में देशभर से आए 100 से अधिक लोक, पारंपरिक और जनजातीय कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के महत्व को रेखांकित किया।

Sadanira Samagam : विभिन्न कला शैलियों के कलाकारों ने लिया हिस्सा
कार्यशाला में पटुआ, कलमकारी, जोगी कलम, मंजूषा, मिथिला (मधुबनी), टिकुली, वारली, पिथोरा और पहाड़ी चित्रकला जैसी कई प्रसिद्ध भारतीय लोक एवं पारंपरिक कला शैलियों से जुड़े कलाकार शामिल हुए। कलाकारों ने कैनवास, मटकों और छातों पर अपनी कलाकृतियों के जरिए जल और जीवन के गहरे संबंध को अभिव्यक्त किया।
Sadanira Samagam : जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति आस्था को किया प्रदर्शित
कलाकारों द्वारा तैयार की जा रही चित्रकृतियों में नदियों की अविरलता, जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पर्यावरण संतुलन और प्रकृति के प्रति भारतीय समाज की आस्था को प्रमुखता से दर्शाया गया। इन कलाकृतियों के माध्यम से लोगों को जल बचाने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया।

Sadanira Samagam : मंजूषा कला से दिया ‘जल है तो कल है’ का संदेश
बिहार के भागलपुर से आए मंजूषा कला के कलाकार पवन कुमार सागर ने अपनी कला के माध्यम से वर्षा जल संचयन और भूजल संरक्षण का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि बढ़ते शहरीकरण के कारण वर्षा का पानी जमीन में नहीं पहुंच पाता, जिससे भूजल स्तर लगातार कम हो रहा है। उनकी कलाकृति का मुख्य संदेश था कि जल संरक्षण भविष्य की आवश्यकता है और “जल है तो कल है”।
Sadanira Samagam : टिकुली कला की ऐतिहासिक विरासत को किया साझा
पटना से आईं कलाकार अरुंधति महतो ने टिकुली कला की ऐतिहासिक यात्रा और उसके महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह कला मौर्यकालीन परंपरा से जुड़ी हुई है। समय के साथ यह कला विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी, लेकिन प्रसिद्ध कलाकार उपेंद्र महारथी के प्रयासों से इसे नया जीवन मिला। आज हजारों कलाकार इस कला से जुड़े हुए हैं और इसे जीआई टैग दिलाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।

Sadanira Samagam : जनजातीय कलाकारों ने उकेरी ग्रामीण जीवन की सच्चाई
आंध्र प्रदेश के अराकू क्षेत्र से आईं युवा जनजातीय कलाकार तुलसीवेणी ने अपनी चित्रकृतियों में ग्रामीण जीवन और जल संकट की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत की। उनकी पेंटिंग्स में गांवों की महिलाएं दूर-दूर से पानी लाते हुए दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि यह उनके समाज और परिवेश का वास्तविक चित्रण है, जिसे वह अपनी कला के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं।
Sadanira Samagam : वारली कला में दिखी आदिवासी संस्कृति की झलक
महाराष्ट्र के पालघर जिले से आईं मीनाक्षी वायडा ने वारली कला के माध्यम से आदिवासी जीवन और परंपराओं को चित्रित किया। उनकी कलाकृतियों में विवाह संस्कार, सामुदायिक जीवन, लोक परंपराएं और देवी-देवताओं की आराधना के दृश्य प्रमुख रूप से दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि वारली कला आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान है।

Sadanira Samagam : पहाड़ी चित्रकला ने जीवंत की भारतीय लघु कला परंपरा
हिमाचल प्रदेश के चंबा से आईं ज्योति नाथ ने पहाड़ी चित्रकला, चंबा कलम और कांगड़ा कलम की परंपराओं को अपनी कला में जीवंत रूप दिया। उनकी पेंटिंग्स में राधा-कृष्ण, प्रकृति और ऋतुओं से जुड़े विषय प्रमुख रूप से दिखाई दिए, जो भारतीय लघु चित्रकला की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं।
Sadanira Samagam : भील पिथोरा कला में दिखी वर्षा और प्रकृति की आस्था
मध्यप्रदेश के झाबुआ से आईं निर्मला भामोर ने भील पिथोरा कला के माध्यम से आदिवासी समाज की वर्षा और प्रकृति से जुड़ी मान्यताओं को प्रस्तुत किया। उनकी चित्रकला में ‘धाड़ माता’ की पूजा और अच्छी वर्षा की कामना से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं को दर्शाया गया।

Sadanira Samagam : कला के माध्यम से जल संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रयास
सदानीरा समागम के अंतर्गत आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य समाज को जल संरक्षण और जल संवर्धन के प्रति जागरूक करना है। कलाकारों का मानना है कि भारतीय लोक और जनजातीय कलाएं सदियों से प्रकृति और मानव जीवन के सामंजस्य का संदेश देती रही हैं। ऐसे में जल जैसे महत्वपूर्ण विषय को कला के माध्यम से प्रस्तुत करना वर्तमान समय की आवश्यकता है।
Sadanira Samagam : संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम
सदानीरा समागम केवल एक कला कार्यशाला नहीं बल्कि संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक जागरूकता का ऐसा मंच बनकर उभरा है, जहां देशभर की विविध कला परंपराएं एक साथ आकर जल संरक्षण और प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रही हैं। यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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