पंच परिवर्तन सर्व समृद्धि का सूत्र

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इस सौ वर्ष की यात्रा का आंकलन करना या इस यात्रा के बारे में अपने शब्दों में कुछ भी कहने के लिए आपको एक स्वयंसेवक होना जरूरी है। स्वयंसेवक होने की अनुभूति वही कर सकता है, जो खुद स्वयंसेवक हो और उसमें समाज को देने ( परोपकार ) की भावना प्रबल हो।

हम उस महान यात्रा के बारे में बात कर रहे हैं जिसकी कल्पना मात्र से आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे, और आप उस अनुभव को प्राप्त करेंगे जो हमारे पूर्वजों ने इस सौ वर्ष के लंबे कार्यकाल में समाज को देने और देने और सिर्फ देने के लिए ही अपने पूरे जीवन की आहुति दे दी। इस महायज्ञ में अनेकों हुतात्माओं ने अपने जीवन की आहुति दे दी। और अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का यह महायज्ञ अभी भी जारी है, और राष्ट्र को अपना जीवन समर्पित करने वाले महान बलिदानी आज भी अपना सर्वत्र निछावर करने के लिए तैयार खड़े हैं।

शताब्दी वर्ष की इस महान यात्रा में पंच परिवर्तन सर्व समृद्धि का सूत्र हैं।हम सब ने ही बचपन में एक कहानी सुनी है, जिसमें एक बाप अपने बच्चों को एकता में कितनी शक्ति है बतलाने के लिए लकड़ियों का उदाहरण देकर एकता की शक्ति से उन्हें परिचित कराता है,और सभी को मिलजुल कर रहने के लिए प्रेरित करता है।

पंच परिवर्तन के सूत्र से संघ वर्षों से सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व का बोध, नागरिक कर्तव्य इस “महामंत्र” से राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए प्रयत्नशील हैं, और वहां अपने इस उद्देश्य में सफल भी हो रहा है, पर सफलता का मतलब यहां, यह नहीं है कि आप कोई पड़ाव पर जाकर रुक जाएं। यह कष्टों से भरी निरंतर चलने वाली वह यात्रा है, जिसका सुख एक परोपकारी ही ले सकता है।

ऐसा व्यक्ति जो मानवता के लिए सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अपना समय, प्रतिभा और धन देता है।

ऐसे व्यक्तियों का निर्माण जो वर्षों से करता आ रहा है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। 27 सितंबर 1925 विजयदशमी के पावन अवसर पर महामानव डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। जिसकी आज दैनिक शाखाओं की संख्या चालीस हजार से ज्यादा है। सौ वर्षों से संघ व्यक्ति निर्माण का काम कर रहा है, जो ऐसे व्यक्तियों का निर्माण कर रहा है जो परोपकार की प्रकाष्ठा को भी पार करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।

पंच परिवर्तन का सूत्र वर्तमान समय में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, आज के दौर में आधुनिकता की होड़ मची हुई है, और इंटरनेट के माध्यम से लोग अपने आप को जोड़कर खुद को महान बनाने में लगे हुए हैं, पर जड़ों से दूर होने की जो आपा-धापी मची है, वह हमें सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर ले जा रही है। पश्चात संस्कृति की होड हमें हमारी जड़ों से दूर कर रही हैं। हम अपनी संस्कृति, परंपराओं और अपने इतिहास से दूर होते जा रहे हैं।

पंच परिवर्तन का सूत्र हमें स्वयं को पहचानने के लिए सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए परिवार के साथ बैठकर अपने मन की बात करने के लिए और परिवार के सभी सदस्यों का सामूहिक वार्तालाप ही उनमें परस्पर प्रेम और सम्मान की भावना जगाने के लिए अपने नागरिक कर्तव्यों का बोध करने स्वच्छता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने और पर्यावरण संरक्षण क्यों जरूरी है इस बात को सभी लोग समझ लें और पर्यावरण का दोहन ना करके उसका संरक्षण करें।
व्यष्टि से समष्टि तक और व्यक्ति से विश्व के प्राणीमात्र के समग्र कल्याण की भावना जिन सूत्रों में गुंफित हुई है, उसे पञ्च परिवर्तन में निरुपित किया गया है|

स्व का बोध या आत्म-बोध, किसी व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत पहचान, क्षमताओं, विचारों और भावनाओं को समझने और स्वीकार करने की क्षमता है। जहा व्यक्ति अपने शरीर, मन और भावों के प्रति सचेत रहता है और अपने स्वाभिमान व आत्म-शक्ति से परिपूर्ण रहता है। यह अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषाओं और परंपराओं को समझने से भी जुड़ा है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में शांति और सुरक्षा का अनुभव कर पाता है।

कुटुम्ब प्रबोधन भारतीय संस्कृति के अनुसार समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना जगाने का एक विचार है, जिसमें हर व्यक्ति अपने परिवार के साथ मिलकर देश और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लेता है, वर्तमान समय में जो एकल परिवार की भावना बढ़ रही है उसके प्रति सजग करना और संयुक्त परिवार की ओर लौटना।

सामाजिक समरसता सभी लोगों को उनके जाति, धर्म, लिंग, रंग, या व्यवसाय से परे, बिना किसी भेदभाव के समान मानना, स्वीकार करना और उनके प्रति प्रेम व सम्मान की भावना रखना है। इसका अर्थ है समाज के सभी वर्गों के बीच एकता, सौहार्द और आपसी भाईचारा स्थापित करना।

नागरिक कर्तव्य वे जिम्मेदारियां और दायित्व हैं, जो एक नागरिक के अपने समाज और सरकार के प्रति होते हैं, और जिनमें देश के संविधान का पालन करना, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना, देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना, पर्यावरण की रक्षा करना, और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना शामिल है।

पर्यावरण संरक्षण का अर्थ है पृथ्वी को बचाने, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने और प्रदूषण व अपशिष्ट को कम करने के लिए की जाने वाली गतिविधियां। इसमें जैव-विविधता की रक्षा करना, स्वच्छ हवा और पानी को बढ़ावा देना तथा टिकाऊ प्रथाओं को अपनाना शामिल है, ताकि ग्रह की गुणवत्ता बनी रहे और भावी पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षित रहे।

तो हम सब संकल्प करें, पंच परिवर्तन सर्व समृद्धि के सूत्र को आत्मसात करके भारत भूमि की महान आत्माओं को प्रणाम करते हुए, उन्होंने जिस विश्व परिवार की कल्पना की थी उसमें हम सहभागी बने। और राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने के लिए इस शताब्दी वर्ष की यात्रा में शामिल होकर सशक्त राष्ट्र का निर्माण करें।

लेखक – राजकुमार बरूआ

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