रिपोर्ट: राजेश पंवार
Maheshwar मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल में लोक संस्कृति और अटूट आस्था का महापर्व ‘गणगौर’ हर्षोल्लास के साथ शुरू हो गया है। महेश्वर सहित पूरे क्षेत्र में चैत्र नवरात्रि के दौरान ‘जय रणुबाई-धणियर राजा’ के जयकारे गूंज रहे हैं। अलसुबह परंपरा के अनुसार बाड़ी पूजन किया गया, जिसके साथ ही तीन दिवसीय इस उत्सव का औपचारिक शंखनाद हो गया है।
Maheshwar बेटी की तरह स्वागत: मायके आई मां पार्वती की मनुहार
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, निमाड़ में गणगौर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक उत्सव है। यहाँ माता पार्वती (रणुबाई) को क्षेत्र की लाड़ली बेटी माना जाता है। श्रद्धालु उन्हें अपने घर (मायके) आमंत्रित करते हैं और तीन दिनों तक उनकी विशेष सेवा की जाती है। बाड़ी पूजन के बाद भक्त ढोल-नगाड़ों के साथ ज्वारों के रूप में माता को रथों में विराजित कर अपने घर ले जा रहे हैं।
Maheshwar लोक संस्कृति का अनूठा संगम: झालरिया नृत्य और विशेष भोग
गणगौर पर्व निमाड़ी अस्मिता का प्रतीक है। अखंड सौभाग्य की कामना के लिए महिलाएं कठिन उपवास रखती हैं और पारंपरिक ‘झालरिया’ नृत्य के माध्यम से माता की आराधना करती हैं। सिर पर माता का रथ रखकर नृत्य करना इस पर्व की सबसे विशिष्ट पहचान है। उत्सव के दौरान घरों में विशेष साज-सज्जा की गई है, जहाँ माता को ‘आम्रस-पूरी’ जैसे पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाकर लोक गीतों से उनकी महिमा का गुणगान किया जा रहा है।
Maheshwar आस्था और आधुनिकता के बीच अटूट जुड़ाव
आज के आधुनिक दौर में भी निमाड़वासी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े हुए हैं। बाड़ी से निकलकर जब माता के जवारे भक्तों के द्वार पहुँचते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। अगले तीन दिनों तक निमाड़ का हर घर एक मंदिर के समान प्रतीत होगा, जहाँ आपसी प्रेम, पारिवारिक सौहार्द और सांस्कृतिक गौरव की झलक साफ दिखाई देगी।
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