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मूंग खरीदी में नया टकराव: वेयरहाउसिंग और मार्कफेड आमने-सामने, खराब क्वालिटी को लेकर ठहराया जा रहा एक-दूसरे को जिम्मेदार

BY: Yoganand Shrivastva

भोपाल/इंदौर मध्य प्रदेश में MSP पर चल रही ग्रीष्मकालीन मूंग खरीदी को लेकर अब राज्य की दो प्रमुख संस्थाएं – मार्कफेड (मप्र राज्य सहकारी विपणन संघ) और वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन – एक-दूसरे के आमने-सामने आ गई हैं। ताज़ा विवाद की जड़ है खरीदी गई मूंग की खराब गुणवत्ता और उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है।


विवाद की जड़ क्या है?

वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन के एमडी अनुराग वर्मा ने मार्कफेड को पत्र लिखते हुए यह साफ किया है कि खराब मूंग की जिम्मेदारी उनकी संस्था की नहीं है, क्योंकि मूंग की गुणवत्ता की जांच करने वाले सर्वेयर मार्कफेड की सहायक संस्था नैफेड द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। इसलिए अगर गुणवत्ता में गड़बड़ी मिलती है तो उसकी भरपाई वेयरहाउसिंग की राशि से नहीं की जानी चाहिए।


मार्कफेड का जवाब: “डबल लॉक में मूंग हमारी देखरेख में नहीं”

मार्कफेड के एमडी आलोक सिंह का कहना है कि भले ही सर्वेयर नैफेड के हों, लेकिन जब मूंग वेयरहाउसिंग गोदामों में रखी जाती है, तो वहां की ज़िम्मेदारी वेयरहाउसिंग की होती है। उन्होंने कहा कि गोदामों में मूंग को डबल लॉक सिस्टम में रखा जाता है और यदि वहां नमी, मिट्टी या अन्य नुकसान होते हैं तो उसकी जवाबदेही वेयरहाउसिंग की बनती है।


रायसेन, नर्मदापुरम में उठे सवाल

साल 2023-24 और 2024-25 की खरीदी गई मूंग में रायसेन और नर्मदापुरम जिलों में खराब स्टॉक की शिकायतें सामने आई हैं। इसे लेकर वर्मा ने मार्कफेड को स्पष्ट किया कि यह नुकसान वेयरहाउसिंग की राशि से नहीं काटा जाए, क्योंकि खरीदी के वक्त उनके प्रतिनिधि मौजूद नहीं थे।

वहीं, आलोक सिंह का कहना है कि वेयरहाउसिंग का पत्र मिला था और उसका जवाब भी भेज दिया गया है, अब कोई बड़ा विवाद नहीं है।


18 जिलों में होगी खरीदी, केंद्र से 3.51 लाख मीट्रिक टन की मंजूरी

केंद्र सरकार ने हाल ही में मध्य प्रदेश को 3.51 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी की मंजूरी दी है, जो राज्य के 18 जिलों में MSP पर की जाएगी। खरीदी केंद्रों पर कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर रखे गए सर्वेयर गुणवत्ता जांच का काम संभालते हैं, लेकिन बीते वर्षों में इन सर्वेयरों की भूमिका पर कई बार सवाल उठे हैं और कार्रवाई भी हो चुकी है।


अमानक फसल की भी होती है एंट्री

मप्र वेयरहाउसिंग एंड लॉजिस्टिक्स कॉर्पोरेशन फील्ड स्टाफ एसोसिएशन के अध्यक्ष दिलीप सिंह राजपूत ने कहा कि खरीदी प्रक्रिया के दौरान उपार्जन एजेंसियों के प्रतिनिधि मौके पर मौजूद होते हैं। एक साथ कई जगहों पर खरीदी होती है, जिससे सिर्फ 5 से 10% बोरियों की ही जांच हो पाती है, और कभी-कभी अमानक फसल भी गोदाम तक पहुंच जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सिर्फ वेयरहाउसिंग को दोषी ठहराना उचित नहीं है।

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