BY: MOHIT JAIN
मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले की कैंसर पहाड़ी पर स्थित मांढरे वाली माता मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर करीब 150 साल पुराना है और यहां विराजमान देवी अष्टभुजा माता को सिंधिया राजवंश की कुलदेवी माना जाता है।
मान्यता है कि सिंधिया परिवार का कोई भी शुभ कार्य माता के दर्शन के बिना शुरू नहीं होता।
मंदिर का धार्मिक महत्व

ग्वालियर शहर के बीचों-बीच स्थित यह मंदिर केवल श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि सिंधिया राजवंश के लिए भी विशेष है।
- हर साल राजपरिवार के मुखिया माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।
- किसी भी नए कार्य या राजकीय परंपरा की शुरुआत से पहले यहां पूजा-अर्चना होती है।
- नवरात्रि और दशहरे के अवसर पर मंदिर में विशेष आयोजन किए जाते हैं।
इतिहास: महाराष्ट्र से ग्वालियर तक यात्रा
करीब 150 वर्ष पूर्व, महाराष्ट्र के सतारा जिले में मांढरे वाली माता का मंदिर हुआ करता था। वहां आनंदराव मांढरे इसकी पूजा करते थे।
महाराज जयाजीराव सिंधिया ने उन्हें ग्वालियर बुलाया और सेना की जिम्मेदारी सौंपी।
कहानी के अनुसार, माता ने सपने में आदेश दिया कि या तो वे उनके पास आएं या प्रतिमा को अपने साथ ले जाएं। इसके बाद महाराज ने माता की प्रतिमा सतारा से ग्वालियर लाकर कैंसर पहाड़ी पर स्थापित की।
स्थापत्य और मान्यताएं

मांढरे वाली माता का मंदिर 13 बीघा भूमि पर फैला है, जिसे रियासतकाल में सिंधिया राजवंश ने दान किया था।
- मंदिर की अष्टभुजा काली प्रतिमा को महिषासुर मर्दिनी का स्वरूप माना जाता है।
- विजय विलास पैलेस के सामने स्थित यह मंदिर इतना ऊंचा है कि पहले महल से दूरबीन के जरिए देवी के दर्शन किए जाते थे।
- भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है।
नवरात्रि और दशहरे की विशेष परंपराएं
नवरात्रि में मंदिर का विशेष श्रृंगार किया जाता है। दशहरे पर सिंधिया राजपरिवार राजकीय पोशाक में यहां पहुंचकर माता का पूजन करता है।
मंदिर परिसर में मौजूद शमी वृक्ष का पूजन दशहरे के दिन परंपरा के रूप में आज भी किया जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वयं अपने परिवार के साथ यहां उपस्थित होकर परंपरा निभाते हैं
ग्वालियर का मांढरे वाली माता मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास और परंपरा से जुड़ा हुआ एक जीवंत उदाहरण है।
150 साल से अधिक समय से यह मंदिर न सिर्फ सिंधिया राजवंश की कुलदेवी का धाम है, बल्कि श्रद्धालुओं की भावनाओं का भी आधार बना हुआ है।





