Report: Vandna Rawat
Lucknow उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहचान आमतौर पर एक सख्त प्रशासक और अपराध के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति रखने वाले नेता की रही है। लेकिन इस कठोर छवि के भीतर एक अत्यंत कोमल और संवेदनशील हृदय भी बसता है, जो विशेष रूप से बच्चों के लिए सदैव तत्पर रहता है। 25 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में योगी आदित्यनाथ न केवल एक मुख्यमंत्री, बल्कि बच्चों के लिए एक स्नेही अभिभावक की भूमिका में भी नजर आते हैं।
बालहठ के आगे ‘सख्त’ मुख्यमंत्री का नरम अंदाज
Lucknow मुख्यमंत्री की कार्यशैली में अनुशासन सर्वोपरि है, लेकिन बच्चों की मासूमियत के सामने वह अक्सर अपना सख्त रुख छोड़ देते हैं। चाहे गोरखपुर का जनता दर्शन हो या लखनऊ का सरकारी आवास, बच्चों से मिलते समय उनके चेहरे पर आने वाली मुस्कान उनकी आत्मीयता को दर्शाती है।
- संस्कारों का बीजारोपण: जापान यात्रा के दौरान जब एक बच्चा मंत्र भूल गया, तो मुख्यमंत्री ने स्वयं उसे पूरा कर न केवल उसका हौसला बढ़ाया बल्कि विदेशी धरती पर भी भारतीय संस्कृति की अलख जगाई।
- वात्सल्य का भाव: गणतंत्र दिवस हो या मकर संक्रांति, बच्चों का उनके साथ फोटो खिंचवाना या ‘चिप्स’ जैसी मासूम मांग करना यह सिद्ध करता है कि बच्चे उन्हें अपना करीबी मानते हैं।
संकट में बने सहारा: शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक की चिंता
Lucknow योगी आदित्यनाथ के लिए ‘जन सेवा’ केवल फाइलों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कई बेसहारा और जरूरतमंद बच्चों के भविष्य को व्यक्तिगत रुचि लेकर संवारा है। उनके हस्तक्षेप ने कई परिवारों के आंसू पोंछने का काम किया है।
- आवाज बनी उम्मीद: कानपुर की मूक-बधिर बच्ची खुशी गुप्ता की पीड़ा सुनकर मुख्यमंत्री ने न केवल उसका इलाज कराया, बल्कि आज वह बच्ची बोलने और सुनने में सक्षम है।
- शिक्षा का अधिकार: लखनऊ की अनाबी, मुरादाबाद की वाची और गोरखपुर की पंखुड़ी जैसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ आर्थिक तंगी या अन्य बाधाओं के कारण रुकी हुई पढ़ाई को मुख्यमंत्री ने अपने प्रयासों से दोबारा शुरू कराया।
- न्याय की त्वरित जीत: मेजर की बेटी अंजना भट्ट के घर को 24 घंटे के भीतर कब्जामुक्त कराकर उन्होंने यह संदेश दिया कि प्रदेश का हर बच्चा उनके परिवार का हिस्सा है।
Lucknow विपदा में तत्काल सहायता और संवेदनशीलता
Lucknow मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिलता है जब वह जनता दर्शन में आए पीड़ितों की व्यथा सुनकर मौके पर ही समाधान सुनिश्चित करते हैं। लखीमपुर खीरी के दो अनाथ भाइयों, शिवांशु और अजय की कहानी हो या कैंसर पीड़ित मरीज को सीधे अस्पताल भिजवाना, उनकी कार्यप्रणाली में मानवीय संवेदनाएं प्राथमिकता पर रहती हैं। वह केवल आदेश नहीं देते, बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि मदद पीड़ित के घर पहुँचने से पहले ही उपलब्ध हो जाए। यह ‘संवाद से संस्कार’ विकसित करने की उनकी अनूठी कला है, जो उन्हें एक राजनेता से ऊपर उठाकर एक जन-नायक बनाती है।
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