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Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 14 : कमाई की दौड़, रिश्तों की होड़, खुशियों की EMI पर ज़िंदगी !

भैया, ना खुशियाँ खरीद पाया, ना ग़मों का ठेला खोल पाया, फिर भी हर सुबह “सेल” लगा कर कमाने निकल आया। जेब में सपने, माथे पर पसीना, ज़िंदगी बोली, भाई, तू है बड़ा नगीना ! नारी को जो सताए, उसका इतिहास मिट जाए, रावण, कौरव, कंस सबक बन जाए। संत

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 13 : नया खेल मुनाफाखोरी, खिलाड़ी… शिक्षा-स्वास्थ्य और कृषि, रेफरी…चुप्पी !

Hasya Hathauda : भैया, देश में एक नया राष्ट्रीय खेल चल रहा है, मुनाफाखोरी यानि आम आदमी से खूब मुनाफा वसूलो, इस खेल के खिलाड़ी हैं, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और रेफरी है…चुप्पी, आम आदमी दर्शक नहीं, मैदान है, जिस पर सब खेलते हैं। वैसे इस खेल के और भी नाम

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 12 : इंपोर्टेड मानसिकता का असर, संस्कार लकवाग्रस्त !

Hasya Hathauda : भैया, हम कुछ भी खरीदें तो पूछें इंपोर्टेड है क्या? ये बात थी 47-50 की, अब 2026 आ गया, भारत मे उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण हो गया, कितना कुछ बदल गया, पर मस्तिष्क से इंपोर्टेड अब तक नहीं गया, देसी में भरोसा अब तक नहीं लौटा, जूता हो

Hasya Hathauda swadesh news

Hasya Hathauda 11 : महंगाई डायन की डाइटिंग, बेटी को दहेज में ‘सोने का तकिया’ !

Hasya Hathauda : भैया, महंगाई डायन खाय जात है, अब सिर्फ गाने में नहीं, आम आदमी की थाली में बैठ गई है। हर महीने तनखा वही पुरानी, नौ हज़ार आती है और महंगाई डायन पूछती भी नहीं, सीधे खा जाती है। आम आदमी की हालत ऐसी होती जा रही कि

Hasya Hathauda 10

Hasya Hathauda 10 : ‘रील क्रांति’, न कोई गिरफ्तारी, न कोई संघर्ष, न कोई जोखिम !

Hasya Hathauda 10 : भैया, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां क्रांति अब सड़कों पर नहीं, रील्स में होती है। पहले लोग आंदोलन के लिए घर से निकलते थे, अब मोबाइल निकालते हैं। पहले नारे लगते थे, अब कैप्शन लगते हैं और सबसे बड़ी बात क्रांति अब

Hasya Hathauda 09

Hasya Hathauda 09 : हम अमरिकनों से ज्यादा अधिकार संपन्न हैं…!

Hasya Hathauda 09 भैया, अमेरिका आर्थिक रूप से जितना विकसित है, उतना ही नागरिक बोध यानी सिविक सेंस के मामले में आगे है। वहां सिविक सेंस सभ्य समाज की पहचान है, जबकि हमारे यहां… उसे अक्सर नागरिक अधिकार समझ लिया जाता है। मतलब नियम तोड़ना भी अधिकार, और टोको तो

Hasya Hathauda 08

Hasya Hathauda 08 : ‘रिलेशनशिप’ की नाजायज औलाद ‘कॉन्वेंट’ ! 🤔

Hasya Hathauda 08 : आज का हास्य हथौड़ा कॉन्वेंट स्कूल मानसिकता पर, ‘इंपोर्टेड है’, अगले कॉलम में पढ़िए..भैया, अंग्रेजों की गुलामी से आजादी तो हमें 1947 में मिल गई, लेकिन असली आज़ादी अभी एलकेजी में अटकी हुई है। कारण साफ़ है, कॉन्वेंट मानसिकता। आज हमारे देश में शिक्षा नहीं, इंग्लिश

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda : मैं गौ माता हूं…और भारत का हर इंसान मेरी संतान है…?

Hasya Hathauda : मैं गौ माता हूं, मुझे मेरी नहीं हम सबकी चिंता है, इसलिए मैं की जगह हम शब्द बोलूंगी तो सुनो, हमें ये सम्मान यूँ ही नहीं मिला है।सनातन संस्कृति में पाँच हज़ार साल की साधना है हमारी।भारत के हर घर, हर मठ, हर कथा और हर धार्मिक

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Hasya Hathauda : अहंकार, अभिमान और दंभ, तीनों की चाय पर चर्चा… ! 😀

Hasya Hathauda : भैया, एक दिन अहंकार और अभिमान चाय की दुकान पर बैठे थे। अहंकार ने चाय का पहला घूंट लिया और बोला, तुम बड़े घमंडी हो। अभिमान ने बिना चीनी वाली चाय में भी मिठास ढूंढ ली और बोला, इसमें क्या शक है? मुझे अपने घमंड पर गर्व

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda : कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी…

गणतंत्र दिवस की आप सभी को बहुत शुभकामनाएं। Hasya Hathauda : भैयाजी, हम 77वां गणतंत्र मना रहे हैं, देश भक्ति तो हमारे खून में है, जब भी कोई भारत को आंख दिखाता है, हमारा खून खौल उठता है, भारत के हर घर का नारा है, हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई आपस में सब