Bharatiya Bhasha Anushthan : भारत की पहचान उसकी विविधता में है और इस विविधता का सबसे मजबूत आधार उसकी भाषाएं हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाने वाली मातृभाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके साथ इतिहास, संस्कृति, परंपराएं, लोकज्ञान और पीढ़ियों की स्मृतियां भी जुड़ी हुई हैं। इसी विषय को केंद्र में रखते हुए भारतीय भाषा अनुष्ठान के पहले सत्र में मातृभाषा, भारतीय भाषाओं की परंपरा, कश्मीरी संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय एकता में भाषाओं की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई।इस सत्र का विषय ‘मातृभाषा से राष्ट्रभाषा, भाषाओं में भारत की आत्मा’ रहा। कार्यक्रम में बांग्ला, कश्मीरी और भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पक्षों से जुड़े वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।
Bharatiya Bhasha Anushthan: मातृभाषा को सिर्फ हिंदी दिवस तक सीमित न करें
कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहाशीष सुर ने कहा कि मातृभाषा को केवल हिंदी दिवस जैसे किसी एक अवसर तक सीमित करके देखने की जरूरत नहीं है। भारतीय भाषाओं के विकास को व्यापक दृष्टिकोण से समझना होगा और सभी भाषाओं के बीच आपसी समन्वय को बढ़ावा देना जरूरी है।उन्होंने कहा कि भारत सिर्फ उसके भूगोल, राजनीतिक सीमाओं और संविधान में ही नहीं बसता, बल्कि देश की भाषाओं, बोलियों, लोककथाओं, लोरियों और स्थानीय ज्ञान परंपराओं में भी भारत की आत्मा दिखाई देती है। यही विविधता देश की बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है।
Bharatiya Bhasha Anushthan: कोलकाता का भाषाई और पत्रकारिता इतिहास रहा समृद्ध
स्नेहाशीष सुर ने कोलकाता के भाषाई इतिहास और पत्रकारिता परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि बांग्ला के साथ हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और फारसी जैसी भाषाओं के प्रकाशन और पत्रकारिता के विकास में कोलकाता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।उन्होंने देश की भाषाई विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की ताकत किसी एक भाषा तक सीमित नहीं है। अलग-अलग भाषाओं का साथ मौजूद रहना और उनका लगातार विकसित होना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। उन्होंने 2011 की जनगणना के आंकड़ों के संदर्भ में हिंदी के व्यापक भाषाई आधार की भी चर्चा की।
Bharatiya Bhasha Anushthan: मातृभाषा व्यक्ति की भावनाओं से जुड़ी होती है
सत्र में मातृभाषा और अंग्रेजी के संबंध पर भी विचार रखे गए। स्नेहाशीष सुर ने कहा कि मातृभाषा व्यक्ति की पहली भाषा होने के साथ उसके अनुभवों और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी होती है।उन्होंने बदलते मीडिया परिदृश्य का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं की पहुंच लगातार बढ़ रही है। डिजिटल माध्यमों ने क्षेत्रीय और भारतीय भाषाओं में सामग्री के विस्तार के लिए भी नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।उन्होंने बांग्ला पत्रकारिता के लगभग दो सौ वर्ष पुराने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारिता ने सामाजिक जागरण के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Bharatiya Bhasha Anushthan: कश्मीरी भाषा में दिखाई देती है संस्कृति और पहचान
द लेजिटिमेट साप्ताहिक पत्रिका और खबर उर्दू, श्रीनगर के संपादक आसिम मोहिउद्दीन ने कश्मीरी भाषा और संस्कृति के भारत की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से संबंध पर चर्चा की।उन्होंने कहा कि कश्मीरी भाषा उनके लिए सिर्फ बोलचाल का जरिया नहीं है। यह परिवार, माता-पिता, दादा-दादी, गांव की कहानियों और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी पहचान का हिस्सा है। भाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने अतीत और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है।
Bharatiya Bhasha Anushthan: नीलमत पुराण और राजतरंगिणी का किया उल्लेख
आसिम मोहिउद्दीन ने कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा पर चर्चा करते हुए नीलमत पुराण और कल्हण की राजतरंगिणी का उल्लेख किया। उन्होंने कश्मीर की नदियों, पर्वतों, त्योहारों और स्थानीय परंपराओं के जरिए वहां की सांस्कृतिक विरासत को समझाने का प्रयास किया।उन्होंने कहा कि कश्मीर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को भारत की व्यापक परंपराओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहां की संस्कृति का विकास देश की साझा सांस्कृतिक धारा से जुड़ा रहा है।
Bharatiya Bhasha Anushthan: शारदा पीठ का शिक्षा परंपरा में अहम स्थान
आसिम मोहिउद्दीन ने शारदा पीठ को शिक्षा, दर्शन और विद्या की महत्वपूर्ण परंपरा से जुड़ा केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक ही भाषा बोलें।उनके मुताबिक भारत की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं एक साथ आगे बढ़ें। भाषाई विविधता को बनाए रखना देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का माध्यम हो सकता है।
Bharatiya Bhasha Anushthan: इतिहास और पुरातत्व से समझी जा सकती है भाषाओं की यात्रा
उज्जैन के रमन सोलंकी ने भारतीय भाषाओं और अखंड भारत की सांस्कृतिक अवधारणा के संदर्भ में इतिहास और पुरातत्व की भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इतिहास और पुरातत्व के जरिए समाज अपने अतीत को समझता है और उससे सीख लेकर भविष्य की दिशा तय कर सकता है।उन्होंने भारतीय भाषाओं और लिपियों के विकास की चर्चा करते हुए ब्राह्मी, खरोष्ठी और देवनागरी जैसी लिपियों का उल्लेख किया। उन्होंने विभिन्न ऐतिहासिक और अभिलेखीय प्रमाणों के माध्यम से भारतीय भाषाओं के विकास और उनकी प्राचीन परंपरा को समझाया।
Bharatiya Bhasha Anushthan: अभिलेखों में दर्ज है भारतीय भाषाओं का इतिहास
रमन सोलंकी ने अशोक के अभिलेखों, गुप्तकालीन अभिलेखों और विक्रमादित्य से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भाषाओं और लिपियों के अध्ययन से केवल भाषा का इतिहास नहीं समझा जाता, बल्कि इसके जरिए भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक विकास की तस्वीर भी सामने आती है।उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व और अभिलेखीय स्रोतों का अध्ययन महत्वपूर्ण है। इसी संदर्भ में उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
Bharatiya Bhasha Anushthan: भारतीय भाषाओं की प्राचीनता पर हुआ मंथन
प्रशांत पौराणिक ने भी भारतीय भाषाओं की प्राचीनता और उनके विकास को इतिहास एवं पुरातत्व के नजरिए से समझाया। उन्होंने कहा कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य भारतीय सभ्यता की निरंतरता को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।उन्होंने कश्मीर, नीलमत पुराण, प्राचीन नदियों और भारतीय लिपियों के विकास का उल्लेख करते हुए भाषाओं को भारत की लंबी सांस्कृतिक यात्रा से जोड़कर देखा।
Bharatiya Bhasha Anushthan: भाषाओं का संरक्षण यानी संस्कृति का संरक्षण
सत्र में वक्ताओं की चर्चा से यह बात सामने आई कि भारत की पहचान उसकी भाषाई विविधता में गहराई से जुड़ी हुई है। देश की प्रत्येक मातृभाषा अपने साथ साहित्य, लोकज्ञान, परंपराएं, इतिहास और सामाजिक स्मृतियों की विरासत लेकर चलती है।ऐसे में किसी मातृभाषा का संरक्षण सिर्फ उसके शब्दों और बोलने वालों को बचाने का विषय नहीं है। इसके साथ उस भाषा से जुड़ी लोककथाओं, साहित्य, रीति-रिवाजों, ज्ञान और सांस्कृतिक स्मृतियों को भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी जुड़ी है।
Bharatiya Bhasha Anushthan: भाषाई विविधता को बताया भारत की शक्ति
कार्यक्रम के दौरान यह साझा संदेश उभरकर सामने आया कि भारत की एकता उसकी भाषाई समानता में नहीं, बल्कि विविध भाषाओं और संस्कृतियों के सह-अस्तित्व में है। अलग-अलग भाषाओं की अपनी पहचान होने के बावजूद वे भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती हैं।भारतीय भाषा अनुष्ठान के इस प्रथम सत्र का समन्वयन विजय मनोहर तिवारी ने किया। सत्र में मातृभाषाओं के संरक्षण, भारतीय भाषाओं के विकास और उनके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व को लेकर व्यापक विमर्श हुआ।
read more : India vs Afghanistan : आज कितने बजे शुरू होगा मैच, TV और मोबाइल पर ऐसे देखें लाइव


