Bastar Tricolor Campaign : आजाद हुआ नक्सलियों का गढ़, आजादी उत्सव,नक्सलियों दबदबा खत्म, अब लहराया तिरंगा
Bastar Tricolor Campaign : बस्तर में कभी गोलियों और बारूद की गूंज सुर्खियां बनती थी, लेकिन आज तस्वीर बदलने का दावा किया जा रहा है। तिरंगा यात्रा, ढोल की थाप और आदिवासी संस्कृति के बीच डिप्टी सीएम विजय शर्मा का वीडियो अब सियासी संग्राम का नया मुद्दा बन गया है। कांग्रेस ने वीडियो को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा है, तो बीजेपी इसे आदिवासी संस्कृति और राष्ट्र गौरव से जोड़ रही है। यानी बस्तर में तिरंगा भी है और सियासत का रंग भी गहरा है।देखिये सियासत पर एक रिपोर्ट!दरअसल नारायणपुर से दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों तक बस्तर में तिरंगा यात्रा का संदेश साफ है जहां कभी नक्सलियों का दबदबा था, वहां अब तिरंगा लहराएगा। बीजेपी 12 से 14 अगस्त तक चल रही इस यात्रा के दौरान सरकार 90 से ज्यादा गांवों में पहली बार तिरंगा फहराने की बात कह रही है। विजय शर्मा आदिवासी ग्रामीणों के बीच पहुंचे, ढोल बजाया और थिरके। सरकार इसे बदलते बस्तर और खत्म होते माओवाद की तस्वीर बता रही है।
Bastar Tricolor Campaign : लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू कांग्रेस दिखा रही है। विजय शर्मा के ढोल बजाते वीडियो को कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सीधा सवाल दागा कल तक विश्व आदिवासी दिवस को लेकर परहेज और आज आदिवासी संस्कृति के साथ इतना अपनापन क्यों ? कांग्रेस ने बीजेपी पर आदिवासी भावनाओं को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और कहा पहले आदिवासी समाज से माफी मांगिए, फिर संस्कृति का प्रदर्शन कीजिए। आदिवासीयों को वोट बैंक और मज़ाक मत बनाइये ! वही अमित चिमनानी ने कांग्रेस के आरोपो पर पलटवार करते हुए कहा आदिवासी हित की बात करने वाली कांग्रेस बिरसा मुंडा जी की जयंती क्यों नहीं मनाई जो बीजेपी ने इसकी शुरुआत की…. राज्यसभा आदिवासी को क्यों नहीं बनाई,क्यों बाहरी लोगों को बनाया गया राष्ट्रपति एक आदिवासी बेटी को बनाने के बाद उस पर भी इनको आपत्ति हुई यानी कांग्रेस को आदिवासियों की हर उन्नति और विकास से पीड़ा है
Bastar Tricolor Campaign : दरअसल, 9 अगस्त के विश्व आदिवासी दिवस को लेकर छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस पहले ही आमने-सामने थीं। अब 14 अगस्त को सामने आया यह वीडियो उसी सियासी बहस को बस्तर की जमीन पर ले आया है। बीजेपी का पलटवार है कि कांग्रेस आदिवासी संस्कृति को राजनीति के चश्मे से देख रही है। बीजेपी का तर्क है कि जनजातीय गौरव, आदिवासी नायकों और उनकी परंपराओं का सम्मान उसकी राजनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा है। बहरहाल अब बस्तर में कहानी सिर्फ ढोल और तिरंगे की नहीं है। कहानी सत्ता के नैरेटिव और विपक्ष के सवालों की भी है। एक तरफ सरकार कह रही है—माओवाद के गढ़ में तिरंगा पहुंचा है। दूसरी तरफ कांग्रेस पूछ रही है तिरंगे के साथ आदिवासी अधिकार और आवाज भी पहुंचेगी या नहीं? क्योंकि माओवाद के कमजोर पड़ने के बाद बस्तर की सबसे बड़ी परीक्षा यही है क्या आदिवासी सिर्फ तस्वीर और सियासत का चेहरा बनेंगे, या विकास, सम्मान और अधिकार के फैसलों में उनकी आवाज भी उतनी ही मजबूत होगी?

