BY: Yoganand Shrivastava
बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने अपने करियर में एक से बढ़कर एक दमदार फिल्में दी हैं, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है ‘आनंद’, जो न केवल एक इमोशनल यात्रा है बल्कि इंसानियत, दोस्ती और जीवन के संघर्ष की खूबसूरत मिसाल भी है।
जब स्क्रीन पर बिखरी राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की केमिस्ट्री
साल 1971 में रिलीज हुई ‘आनंद’ में राजेश खन्ना ने लीड रोल निभाया था, जबकि अमिताभ बच्चन ने उनके डॉक्टर और दोस्त डॉ. भास्कर की भूमिका में सपोर्टिंग रोल किया था। यह वही दौर था जब अमिताभ बच्चन इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, और इस फिल्म में उनकी अदाकारी ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई।
कैंसर से जूझता आनंद, जो ज़िंदगी जीने का नया नजरिया देता है
फिल्म की कहानी एक ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) से पीड़ित युवक आनंद (राजेश खन्ना) पर केंद्रित है, जो जानता है कि उसकी जिंदगी गिनती के दिनों की मेहमान है। लेकिन वह हंसते-हंसते अपनी जिंदगी जीता है और अपने आसपास के लोगों में भी जीवन का उत्साह भरता है। आनंद की पॉजिटिव सोच और डॉ. भास्कर के साथ उसकी गहराती दोस्ती इस फिल्म का भावनात्मक केंद्र है।
अवॉर्ड्स की झड़ी और आईएमडीबी पर शानदार रेटिंग
‘आनंद’ को उस समय 9 प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले थे, जिनमें शामिल हैं:
- बेस्ट एक्टर (राजेश खन्ना)
- बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (अमिताभ बच्चन)
- बेस्ट स्टोरी
- बेस्ट एडिटिंग (ऋषिकेश मुखर्जी)
फिल्म को IMDb पर 8.1 की रेटिंग मिली है, जो इसकी लोकप्रियता और प्रभाव को दर्शाती है। निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी को इस फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिला था।
आज भी रुला देता है फिल्म का अंत
‘आनंद’ का क्लाइमैक्स आज भी दर्शकों की आंखें नम कर देता है। फिल्म के अंत में आनंद के जाने के बाद भी उसका जिंदादिल स्वभाव सबके दिलों में जिंदा रहता है। डॉ. भास्कर के किरदार के ज़रिए अमिताभ बच्चन ने उस दोस्त की व्यथा को जीवंत किया है जो चाहकर भी अपने दोस्त को बचा नहीं पाता।
कहां देख सकते हैं ये कालजयी फिल्म?
अगर आपने अब तक ‘आनंद’ नहीं देखी है या दोबारा देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है। इसके अलावा, इसे यूट्यूब पर भी मुफ्त में देखा जा सकता है।
‘आनंद’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अहसास है—जीवन को देखने का नया नजरिया, दोस्ती की गहराई और मौत के सामने मुस्कुराते हुए खड़े होने की हिम्मत। अमिताभ बच्चन के करियर की यह शुरुआती फिल्म भले ही सहायक भूमिका में थी, लेकिन इसके प्रभाव ने उन्हें एक गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित करने की राह खोल दी।





