BY
Yoganand Shrivastava
Prayagraj इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो इसे कानूनन अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का कर्तव्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, जो सामाजिक धारणाओं या नैतिकता से प्रभावित नहीं हो सकता।

Prayagraj कानून बनाम सामाजिक नैतिकता: कोर्ट का तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान विपक्षी वकील ने दलील दी थी कि चूंकि पुरुष पहले से विवाहित है, इसलिए उसका किसी अन्य महिला के साथ रहना अपराध की श्रेणी में आता है। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून को सामाजिक नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए। पीठ ने कहा, “ऐसा कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है जिसके तहत दो बालिग व्यक्तियों को आपसी सहमति से साथ रहने पर अभियोजित किया जा सके। समाज की राय कोर्ट के निर्णयों को निर्देशित नहीं कर सकती।”

Prayagraj शाहजहांपुर पुलिस को सुरक्षा के कड़े निर्देश
यह मामला शाहजहांपुर के एक जोड़े (अनामिका और नेत्रपाल) से जुड़ा है, जिन्हें महिला के परिजनों से ‘ऑनर किलिंग’ का खतरा था। कोर्ट ने एसएसपी शाहजहांपुर को फटकार लगाते हुए कहा कि दो वयस्कों की सुरक्षा करना पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य है। कोर्ट ने एसएसपी को व्यक्तिगत रूप से जोड़े की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया है और निर्देश दिया है कि महिला के परिवार वाले उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परेशान न करें।

Prayagraj गिरफ्तारी पर रोक और बीएनएस (BNS) की धारा 87 का संदर्भ
याचिकाकर्ताओं के खिलाफ शाहजहांपुर के जैतीपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 87 के तहत अपहरण का मामला दर्ज कराया गया था। हाई कोर्ट ने इस मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 8 अप्रैल तक जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शहंशाह अख्तर खान ने पैरवी की।





