आस्था का क्रिकेट कनेक्शन

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CRICKET MATCH BETWEEN INDIA AND PAKISTAN SPRITUAL CONNECTION

फैन्स की प्रार्थना: भारत और पाकिस्तान में मंदिर-मस्जिद में होने वाली दुआएँ और पूजाएँ

23 फरवरी 2025 को दुबई इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाला चैंपियंस ट्रॉफी मुकाबला सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक भावनात्मक तूफान है। मैदान पर खिलाड़ी अपनी कला दिखाएँगे, लेकिन उससे पहले दोनों देशों के फैंस अपने-अपने तरीके से जीत की कामना कर रहे हैं। भारत में मंदिरों में हवन और पूजा का दौर चल रहा है, तो पाकिस्तान में मस्जिदों में दुआओं का सिलसिला शुरू हो चुका है। यह सिर्फ क्रिकेट का मैच नहीं, बल्कि आस्था और जुनून का संगम है, जहाँ हर प्रार्थना अपनी टीम को विजयी बनाने की उम्मीद से भरी होती है। आइए, इस अनोखे आध्यात्मिक कनेक्शन को करीब से समझें और देखें कि कैसे क्रिकेट दोनों देशों में आस्था का प्रतीक बन जाता है।

भारत में मंदिरों की प्रार्थना

भारत में क्रिकेट को धर्म की तरह देखा जाता है, और जब बात भारत-पाकिस्तान मैच की हो, तो यह जुनून अपने चरम पर पहुँच जाता है। पिछले बड़े टूर्नामेंट्स के अनुभवों को देखें, तो फैंस मंदिरों में अपनी टीम की जीत के लिए पूजा और हवन करते नज़र आते हैं। इस बार भी, 23 फरवरी से पहले देश भर के मंदिरों में तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर दिल्ली के हनुमान मंदिर तक, फैंस भगवान से भारत की जीत की मन्नत माँग रहे हैं।

मुंबई की एक गृहिणी, राधिका शर्मा, बताती हैं, “मैंने पिछले टी20 वर्ल्ड कप में भारत की जीत के लिए हवन किया था। इस बार भी मैं और मेरे पड़ोसी मिलकर एक छोटा हवन करेंगे। हम चाहते हैं कि रोहित और कोहली बड़े रन बनाएँ।” इसी तरह, पंजाब के एक मंदिर में पुजारी हरविंदर सिंह कहते हैं, “हम यहाँ भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि भारत की टीम न सिर्फ जीते, बल्कि शानदार प्रदर्शन करे।” फैंस यहाँ तिलक लगवाते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं, और कुछ तो अपनी जर्सी भी मंदिर में रखकर आशीर्वाद माँगते हैं। यह आस्था उनकी टीम के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाती है।

पाकिस्तान में मस्जिदों की दुआएँ

पाकिस्तान में भी क्रिकेट का जुनून किसी से कम नहीं। यहाँ मस्जिदों में फैंस अपनी नमाज़ के बाद खास दुआएँ माँगते हैं, ताकि उनकी टीम भारत को हराने में कामयाब हो। कराची की जामा मस्जिद से लेकर लाहौर की बादशाही मस्जिद तक, लोग अल्लाह से अपनी टीम की हिफाज़त और जीत की प्रार्थना कर रहे हैं। पिछले मैचों में भी ऐसा देखा गया है, जब पाकिस्तान ने 2017 चैंपियंस ट्रॉफी जीती थी, तो फैंस ने मस्जिदों में शुक्राने की नमाज़ अदा की थी।

लाहौर के एक छात्र, हसन अली, कहते हैं, “मैं हर नमाज़ के बाद दुआ करता हूँ कि बाबर आज़म और शाहीन हमें गर्व करने का मौका दें। यह हमारे लिए सिर्फ खेल नहीं, सम्मान की बात है।” कुछ फैंस तो मस्जिदों में सामूहिक दुआ का आयोजन कर रहे हैं। पेशावर के एक इमाम, मौलाना जफर, बताते हैं, “हमने पिछले हफ्ते से ही खास दुआ शुरू कर दी है। लोग यहाँ आते हैं और कहते हैं कि अल्लाह हमारी टीम को ताकत दे।” यहाँ तक कि कुछ परिवार अपनी टीम की जर्सी को मस्जिद में लाकर उसे आशीर्वाद देने की रस्म करते हैं।

आस्था और क्रिकेट का अनोखा रिश्ता

भारत और पाकिस्तान में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है। दोनों देशों के फैंस अपनी आस्था को इस जुनून से जोड़ते हैं, क्योंकि यह उनके लिए राष्ट्रीय गर्व का सवाल होता है। मंदिरों में मंत्रोच्चार और मस्जिदों में दुआएँ एक ही मकसद से की जाती हैं—अपनी टीम को विजयी देखना। यह आध्यात्मिक कनेक्शन तब और गहरा हो जाता है, जब मैच हाई-वोल्टेज होता है, जैसे भारत-पाकिस्तान का मुकाबला।

दोनों देशों की यह परंपरा नई नहीं है। 2003 वर्ल्ड कप में सचिन तेंदुलकर की शतकीय पारी के बाद भारत में मंदिरों में पूजा हुई थी, तो 1992 वर्ल्ड कप जीतने पर पाकिस्तान में मस्जिदों में दुआओं का दौर चला था। यह आस्था फैंस को एकजुट करती है और उन्हें उम्मीद देती है कि उनकी प्रार्थना मैदान पर चमत्कार कर सकती है। दिल्ली के एक क्रिकेट फैन, अजय वर्मा, कहते हैं, “जब हम प्रार्थना करते हैं, तो लगता है कि भगवान भी हमारी टीम के साथ हैं।” इसी तरह, इस्लामाबाद के एक दुकानदार, यासिर खान, कहते हैं, “दुआ में वो ताकत है, जो शाहीन को यॉर्कर डालने की हिम्मत देती है।”

सामुदायिक एकता का प्रतीक

यह प्रार्थना सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता का भी प्रतीक बनती है। भारत में फैंस गाँवों और मोहल्लों में इकट्ठा होकर हवन करते हैं, तो पाकिस्तान में लोग मस्जिदों में जमा होकर दुआ माँगते हैं। यह एक ऐसा मौका होता है, जब लोग अपने मतभेद भुलाकर एक मकसद के लिए एकजुट होते हैं। यूएई में रहने वाले भारतीय और पाकिस्तानी प्रवासी भी इस परंपरा को जारी रखते हैं। दुबई के एक मंदिर में भारतीय फैंस पूजा करते हैं, तो पास की मस्जिद में पाकिस्तानी फैंस दुआ करते हैं—दोनों अपनी-अपनी टीम के लिए।

क्या प्रार्थना सचमुच असर करती है?

कई फैंस मानते हैं कि उनकी प्रार्थना मैदान पर असर डालती है। जब 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में भारत ने पाकिस्तान को हराया, तो फैंस ने इसे अपनी पूजा का नतीजा बताया। वहीं, 2021 टी20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की जीत को वहाँ के फैंस ने अपनी दुआओं का फल माना। हालाँकि, यह एक मनोवैज्ञानिक विश्वास भी हो सकता है, जो फैंस को अपने खिलाड़ियों के साथ जोड़े रखता है। क्रिकेट विश्लेषक रमेश ठाकुर कहते हैं, “प्रार्थना फैंस का हौसला बढ़ाती है। यह उन्हें लगता है कि उनका भी खेल में योगदान है।”

भारत और पाकिस्तान में मंदिरों और मस्जिदों में होने वाली ये प्रार्थनाएँ क्रिकेट के प्रति आस्था का एक खूबसूरत रूप हैं। 23 फरवरी को जब दुबई में दोनों टीमें आमने-सामने होंगी, तो मैदान के बाहर यह आध्यात्मिक जंग भी अपने चरम पर होगी। भारत में मंत्रों की गूँज और पाकिस्तान में दुआओं की आवाज़ एक ही संदेश देगी—अपनी टीम को जीत दिलाओ। यह आस्था का क्रिकेट कनेक्शन दोनों देशों के फैंस को एक अनोखे तरीके से जोड़ता है, जहाँ हर प्रार्थना एक उम्मीद बनकर उड़ती है। तो आप किसके लिए प्रार्थना करेंगे—नीले रंग की ताकत या हरे रंग के जुनून के लिए? इस आध्यात्मिक उत्सव का हिस्सा बनें और देखें कि क्या ये दुआएँ मैदान पर रंग लाती हैं!

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