अमेरिका: वाइट हाउस में शहबाज,असीम मुलाकात, कराची पहुँचा अमेरिकी युद्धपोत, अमेरिका क्या संदेश देना चाहता है ?

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by: vijay nandan

वॉशिंगटन: अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में नई गर्माहट के संकेत मिले हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल जनरल असीम मुनीर ने हाल ही में वाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाक़ात की। इसी बीच अमेरिकी नौसेना का युद्धपोत USS Wayne E. Meyer कराची बंदरगाह पर आ पहुँचा। यह जहाज़ दो दिन तक कराची पोर्ट पर ठहरने वाला है।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, कराची पोर्ट पर अमेरिकी युद्धपोत की मौजूदगी सिर्फ़ एक रूटीन विज़िट नहीं है, बल्कि अरब सागर क्षेत्र में अमेरिका–पाकिस्तान नौसैनिक सहयोग और रणनीतिक संदेश की ओर इशारा है।

अमेरिका–पाकिस्तान नौसैनिक अभ्यास

कराची पोर्ट पर रुकने के दौरान अमेरिकी नौसेना के अधिकारी पाकिस्तानी नौसेना से मुलाक़ात कर चुके हैं। दोनों सेनाओं ने साझा ट्रेनिंग और “पासेज एक्सरसाइज़” की योजना बनाई है, जिसमें अमेरिकी और पाकिस्तानी जहाज़ मिलकर अरब सागर में ऑपरेशनल अभ्यास करेंगे।

क्यों अहम है यह दौरा

ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह असीम मुनीर का तीसरा अमेरिका दौरा है, जबकि शहबाज शरीफ पहली बार वाइट हाउस पहुँचे। पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान को वॉशिंगटन से दूरी झेलनी पड़ी थी — बाइडेन प्रशासन के दौरान किसी भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से बात तक नहीं हुई। लेकिन चीन और रूस के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकी को देखते हुए अमेरिका अब अपनी मौजूदगी मज़बूत करने में जुटा है।

भारत के लिए संकेत

ट्रंप–शहबाज मुलाक़ात और USS Wayne E. Meyer का कराची पहुँचना, भारत के लिए भी कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है। भारत ने हाल के वर्षों में रूस से सस्ता तेल ख़रीदा और चीन–रूस के साथ रिश्ते बढ़ाए हैं, जिससे वॉशिंगटन में असहजता है। यही नहीं, ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारतीय दवाओं पर 100% टैरिफ लगाने की घोषणा भी की है, जो 1 अक्टूबर से लागू होगा।

कई जानकार मानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप की पाकिस्तान के नेताओं से मुलाक़ात और अमेरिकी युद्धपोत का कराची दौरा इस क्षेत्र में बदलते समीकरणों का संकेत है। हिंद महासागर और अरब सागर का इलाका पहले ही चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव और ग्वादर पोर्ट की वजह से भू-रणनीतिक तनाव में है।

कराची पोर्ट पर अमेरिकी युद्धपोत की मौजूदगी और ट्रंप–शहबाज मुलाक़ात केवल प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि एक बड़े भू-राजनीतिक संदेश की ओर इशारा कर रही है। यह बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों और दक्षिण एशिया में अमेरिकी नीति के नए रुख़ को समझने का संकेत भी है।