BY: Yoganand Shrivastva
भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बीच पाकिस्तान की ओर से परमाणु हथियारों की धमकी भरी बयानबाजी एक बार फिर सुर्खियों में है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि पाकिस्तान में परमाणु हथियारों और उनसे जुड़ी नीतियों का संचालन कौन करता है। यही जिम्मेदारी निभाती है पाकिस्तान की नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA)।
क्या है नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA)?
पाकिस्तान की यह संस्था देश के सामरिक और परमाणु हथियारों से संबंधित सभी मामलों की नीतियाँ तय करती है। इसके अंतर्गत हथियारों का नियंत्रण, संचालन, और परमाणु कार्यक्रम का मार्गदर्शन शामिल है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस संस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
कब हुई थी इसकी स्थापना?
पाकिस्तान की नेशनल कमांड अथॉरिटी की स्थापना वर्ष 2000 में की गई थी। इसका उद्देश्य देश के परमाणु हथियारों पर केंद्रीकृत और सुरक्षित नियंत्रण सुनिश्चित करना था। हालांकि, यह साफ है कि वास्तविक नियंत्रण सेना के हाथ में ही है।
क्या-क्या काम करती है यह संस्था?
1. परमाणु नीति निर्माण
यह संस्था पाकिस्तान की न्यूक्लियर पॉलिसी और रणनीति तैयार करती है। पाकिस्तानी नेता कई बार अपने बयानों में जिन नीतियों का उल्लेख करते हैं, उनका खाका इसी संस्था द्वारा तैयार किया जाता है।
2. हथियारों का प्रबंधन और नियंत्रण
NCA की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि देश के परमाणु हथियार और मिसाइल सिस्टम पूरी सुरक्षा के साथ संचालित हों और किसी भी गैर-सरकारी या आतंकी संगठन के हाथ न लगें। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय कई बार इन हथियारों की सुरक्षा पर चिंता जता चुका है।
कौन होते हैं NCA के प्रमुख सदस्य?
इस संस्था की अगुवाई पाकिस्तान का प्रधानमंत्री करता है, लेकिन इसकी निर्णय प्रक्रिया में कई शीर्ष अधिकारी शामिल होते हैं:
- प्रधानमंत्री (चेयरमैन)
- विदेश मंत्री
- रक्षा मंत्री
- वित्त मंत्री
- थल सेना, वायुसेना और नौसेना प्रमुख
कागज़ों पर इसकी कमान प्रधानमंत्री के हाथ में है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संस्था पाकिस्तान की सेना के नियंत्रण में रहती है। हाल के समय में पाकिस्तानी सैन्य जनरलों के उग्र बयानों से यह बात और स्पष्ट हो जाती है।
क्या केवल दिखावा है यह नियंत्रण?
जहाँ एक ओर NCA यह दावा करती है कि परमाणु हथियारों का उपयोग केवल अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाएगा, वहीं वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान में यह संस्था सेना की मर्जी के बिना कोई कदम नहीं उठा सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही प्रधानमंत्री चेयरमैन हों, लेकिन असली निर्णय शक्ति GHQ (रावलपिंडी) में बैठी फौज के पास होती है।





