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भारत में जाति जनगणना: क्यों कराते थे अंग्रेज, 1931 में कौन-सी जाति थी सबसे बड़ी

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BY: Yoganand Shrivastva

भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास:
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में पहली जनगणना 1872 में कराई गई थी, लेकिन नियमित रूप से जनगणना की शुरुआत 1881 से हुई। इसके बाद हर 10 साल में जनगणना होती रही। जाति के आधार पर आखिरी बार पूरी जनगणना 1931 में हुई थी। अब लगभग 94 साल बाद केंद्र सरकार ने एक बार फिर जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया है।

1931 की जाति जनगणना का महत्व:
1931 की जाति जनगणना के अनुसार, उस समय भारत की कुल आबादी 27.1 करोड़ (271 मिलियन) थी। इस जनगणना के कमिश्नर जे. एच. हटन (JH Hutton) थे। रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जनसंख्या करीब 52% थी। इसी आंकड़े के आधार पर 1980 में मंडल आयोग ने ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की थी।

ब्रिटिश सरकार क्यों कराती थी जाति जनगणना?

ब्रिटिश शासन द्वारा जाति आधारित जनगणना कराने के पीछे कई उद्देश्य थे:

  • सामाजिक ढांचे और पदानुक्रम को समझना
  • प्रशासन, सेना, और शिक्षा में जाति आधारित भर्ती या नीति निर्माण
  • कानूनी और सामाजिक अनुसंधान के लिए डेटा संग्रह
  • एंथ्रोपोलॉजिकल अध्ययन के जरिए नस्लीय विशेषताओं की पड़ताल

ब्रिटिश हुकूमत ने इस डेटा का इस्तेमाल भारतीय समाज को वर्गीकृत और विभाजित करने के लिए भी किया।

1931 में कितनी जातियां दर्ज थीं?

  • 1931 की जनगणना में भारत में कुल 4147 जातियों का उल्लेख किया गया था।
  • जबकि 1901 की जनगणना में यह संख्या 1646 जातियों की थी।
  • यह आंकड़ा दर्शाता है कि समय के साथ जातियों की पहचान और वर्गीकरण कैसे बदले।

2011 में क्या हुआ था?

2011 में यूपीए सरकार ने एक सामाजिक-आर्थिक और जाति आधारित जनगणना (SECC) करवाई थी, लेकिन उसका जाति संबंधी डेटा आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया।

SC वर्ग में कितनी जातियां हैं?

भारत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय के अनुसार:

  • अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी में 1208 जातियां अधिसूचित हैं।
  • आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 60 जातियां इस श्रेणी में आती हैं।
  • अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार में कोई भी SC जाति अधिसूचित नहीं है।

नया फैसला और वर्तमान स्थिति

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स की बैठक में जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया गया है। विपक्ष इस मांग को लंबे समय से उठा रहा था। यह फैसला देश की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में बड़ा बदलाव ला सकता है।

जाति जनगणना केवल एक संख्या का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर आज तक, यह बहस लगातार चलती रही है कि जाति आधारित आंकड़े किस तरह नीतियों को प्रभावित करते हैं।

क्या आप जानना चाहेंगे कि 2025 में प्रस्तावित जाति जनगणना कैसे की जाएगी और उसमें कौन-कौन सी नई बातें जुड़ सकती हैं?

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