SupremeCourt : पीड़िता और परिवार को फैसला लेने का अधिकार, मेडिकल एक्सपर्ट करेंगे मदद
नई दिल्ली : Supreme Court abortion case में गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय रेप पीड़िता की गर्भावस्था को लेकर अहम टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के मामलों में अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए, जबकि डॉक्टर और विशेषज्ञ उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन दें।
SupremeCourt : चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नाबालिग पर अनचाही प्रेग्नेंसी थोपना उचित नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता पहले ही गंभीर मानसिक और शारीरिक आघात से गुजर चुकी है, ऐसे में उसे मजबूर करना उसके दर्द को और बढ़ा सकता है।
SupremeCourt : सुप्रीम कोर्ट ने एम्स जैसे संस्थानों की भूमिका को भी अहम बताया और कहा कि वे परिवार को परामर्श देकर समझदारी से निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि गर्भपात से मां को स्थायी शारीरिक नुकसान का खतरा नहीं है, तो इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है।
SupremeCourt : मामले के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से मौजूदा कानूनों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या रेप पीड़िताओं के मामलों में गर्भपात की तय समय सीमा को बढ़ाने या उसे अधिक लचीला बनाने की जरूरत है। अदालत का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में सख्त समय सीमा उचित नहीं है और कानून को परिस्थितियों के अनुसार बदलना चाहिए।
SupremeCourt : वहीं, सरकार की ओर से पेश पक्ष में मेडिकल जटिलताओं का हवाला दिया गया। बताया गया कि गर्भावस्था काफी आगे बढ़ चुकी है और इस चरण में गर्भपात जोखिम भरा हो सकता है। इसके साथ ही नवजात को गोद देने का विकल्प भी सुझाया गया। हालांकि, कोर्ट ने दोहराया कि अंतिम फैसला पीड़िता और उसके परिवार का ही रहेगा। अदालत ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत अधिकारों और सम्मान का ध्यान रखना बेहद जरूरी है और किसी भी निर्णय में पीड़िता की इच्छा सर्वोपरि होनी चाहिए।

