Ratan Khatri : मुंबई: हाल ही में अभिनेता विजय वर्मा की नई वेब सीरीज ‘मटका किंग’ ओटीटी पर रिलीज हुई है। सट्टेबाजी और पावर की इस दिलचस्प कहानी ने एक बार फिर दर्शकों के बीच उस शख्स की चर्चा छेड़ दी है, जिसकी जिंदगी पर यह सीरीज आधारित बताई जा रही है। हम बात कर रहे हैं रतन खत्री की, जिन्हें कभी भारत में सट्टेबाजी का निर्विवाद बादशाह यानी ‘मटका किंग’ माना जाता था।
Ratan Khatri : कराची से मुंबई का सफर
रतन खत्री का जन्म कराची के एक सिंधी हिंदू परिवार में हुआ था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय उनका परिवार सब कुछ छोड़कर भारत आ गया। मुंबई (तत्कालीन बंबई) में बसे रतन खत्री ने अपनी शुरुआती जिंदगी में काफी संघर्ष किया। किशोरावस्था में उन्होंने कपड़ा मिलों और बाजारों में मजदूरी शुरू की, लेकिन उनकी किस्मत के सितारे कहीं और चमकने वाले थे।

Ratan Khatri : सट्टेबाजी की दुनिया में कदम
उन दिनों मुंबई के कपड़ा बाजार में कपास की कीमतों (कॉटन एक्सचेंज रेट) पर दांव लगाने का चलन था। इसी दौरान रतन खत्री की मुलाकात कच्छ के व्यापारी कल्याणजी भगत से हुई, जो ‘वर्ली मटका’ चलाते थे। खत्री ने कुछ समय उनके साथ काम किया, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपना रास्ता अलग कर लिया।
अपने दोस्तों की सलाह पर रतन खत्री ने अपना खुद का सिंडिकेट शुरू किया, जिसे ‘रतन मटका’ या ‘मेन बाजार मटका’ के नाम से जाना गया। उन्होंने पारंपरिक मटका खेल में कई बदलाव किए, जिससे यह और भी लोकप्रिय हो गया।
Ratan Khatri : पारदर्शिता और विश्वसनीयता ने बनाया ‘किंग’
रतन खत्री ने खेल को पारदर्शी बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन (मटका) से ताश के तीन पत्ते निकालकर नंबर चुनने की पद्धति शुरू की। उनकी इस कार्यशैली ने सट्टेबाजों के बीच एक भरोसा पैदा किया। धीरे-धीरे रतन खत्री का नेटवर्क इतना बड़ा हो गया कि देश-दुनिया की कई रसूखदार हस्तियां उनकी क्लाइंट बन गईं। हालांकि कल्याणजी भगत ने मटका की नींव रखी थी, लेकिन इसे एक संगठित और मुनाफे वाली राष्ट्रीय इंडस्ट्री बनाने का श्रेय रतन खत्री को ही जाता है।
Ratan Khatri : इमरजेंसी और सट्टेबाजी से संन्यास
रतन खत्री का साम्राज्य 1970 के दशक में अपने चरम पर था, लेकिन 1975 में देश में लगी आपातकाल (इमरजेंसी) उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई। पुलिसिया कार्रवाई के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब 19 महीने उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे काटे।
जेल से बाहर आने के बाद खत्री ने धीरे-धीरे इस काली दुनिया से दूरी बनाना शुरू कर दिया। आखिरकार 1990 के दशक में उन्होंने सट्टेबाजी से पूरी तरह संन्यास ले लिया। अपनी जिंदगी के आखिरी साल उन्होंने मुंबई के मध्य क्षेत्र में गुमनामी में बिताए और साल 2020 में उनका निधन हो गया। विजय वर्मा की सीरीज ‘मटका किंग’ अब उसी दौर की रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत को पर्दे पर उतार रही है।

