स्वागत है आपका ‘हास्य हथौड़ा’ के इस ताजा संस्करण में, जहाँ हम मुद्दों को सुलझाते नहीं, बल्कि उन पर व्यंग्य की ऐसी चोट करते हैं कि सिस्टम कराहने लगे। आज बात करेंगे उस अद्भुत प्रेम त्रिकोण की, जिसे दुनिया राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और भ्रष्टाचार के नाम से जानती है।
Hasya Hathauda 16 : कुर्सी का ‘क्रेज’ और वादों की ‘वॉशिंग मशीन’
राजनीति वह जादुई सर्कस है जहाँ हाथी को गायब करना मुश्किल है, लेकिन विकास के करोड़ों रुपयों को पलक झपकते ही गायब कर दिया जाता है। चुनाव के समय नेताजी का हाथ जनता के सामने ऐसे जुड़ता है जैसे फेविकोल का मजबूत जोड़ हो, लेकिन जीतते ही वही हाथ ‘लेने’ और ‘दबाने’ के काम आने लगता है।
आजकल की राजनीति में ‘पार्टी बदलना’ उतना ही आसान है जितना मोबाइल का कवर बदलना। भ्रष्टाचार यहाँ कोई मुद्दा नहीं, बल्कि एक ‘योग्यता’ बन गया है। अगर आप ईमानदारी की बात करें, तो पुराने दिग्गज आपको ऐसे देखेंगे जैसे आप किसी दूसरे ग्रह से आए हों। नेताजी का भाषण सुनिए तो लगता है कि गंगा बस उनके घर के पिछवाड़े से बहने वाली है, लेकिन हकीकत में आम आदमी नाले के पानी में अपनी किस्मत ढूँढ रहा होता है।
Hasya Hathauda 16 :ब्यूरोक्रेसी: फाइल का ‘वनवास’
अब आते हैं साहब बहादुरों पर, यानी हमारी ‘ब्यूरोक्रेसी’। यहाँ फाइलें भगवान राम के वनवास से भी लंबी यात्रा पर निकलती हैं। मेज के नीचे से जाने वाला रास्ता इतना चौड़ा है कि वहाँ से पूरा का पूरा पुल निकल जाए, लेकिन मेज के ऊपर से एक छोटा सा प्रमाणपत्र निकलने में साल भर लग जाते हैं।
ब्यूरोक्रेट्स के लिए ‘कल’ का मतलब वह अनंत काल है जो कभी नहीं आता। साहब की चाय, साहब की मीटिंग और साहब का ‘मूड’—इन तीन बाधाओं को पार करना हिमालय चढ़ने से भी कठिन है। इनके दफ्तर में घुसते ही एक अजीब सी शांति होती है, जिसे केवल ‘गांधी जी’ (करारे नोट) की सरसराहट ही भंग कर सकती है। यहाँ नियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि उन्हें तोड़कर ‘सुविधा शुल्क’ वसूला जा सके।
Hasya Hathauda 16 : भ्रष्टाचार: सिस्टम का ‘ग्रीस’
भ्रष्टाचार अब कोई सामाजिक बुराई नहीं रही, यह तो सिस्टम का ‘ग्रीस’ बन गया है। इसके बिना सरकारी मशीनरी के पहिए जाम हो जाते हैं। छोटे बाबू से लेकर बड़े साहब तक, सबकी अपनी-अपनी ‘रेट लिस्ट’ है। ताज्जुब तो तब होता है जब भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने वाली कमेटी के गठन के लिए भी अलग से बजट और ‘मैनेजमेंट’ की जरूरत पड़ती है।
सड़कें बनती हैं और पहली बारिश में ऐसे गायब हो जाती हैं जैसे गधे के सिर से सींग। पुल गिरने पर जांच बैठती है, जिसमें पता चलता है कि सारा मसाला तो साहब के बंगले की दीवार में लग गया था। यहाँ ईमानदारी एक ऐसी बीमारी मानी जाती है जिसका इलाज ‘सस्पेंशन’ या ‘कालापानी’ (लूप लाइन पोस्टिंग) है।

Hasya Hathauda 16 : जुगलबंदी: अब खादी और खाकी ने मिलाया हाथ
आज के दौर में राजनीति और ब्यूरोक्रेसी के बीच वह ‘छतीस का आंकड़ा’ नहीं रहा, बल्कि अब यह ’69 का अटूट जोड़’ बन चुका है। पहले नेताजी डरते थे कि कहीं साहब फाइल न फंसा दें, और साहब डरते थे कि कहीं नेताजी ट्रांसफर न कर दें। पर अब दोनों ने समझदारी का परिचय देते हुए ‘पीस ट्रीटी’ (शांति समझौता) कर ली है। अब फाइलें फंसाई नहीं जातीं, बल्कि मिल-बांटकर ‘पचाई’ जाती हैं।
भ्रष्टाचार अब इस मशीन का कचरा नहीं, बल्कि इसका सबसे कीमती ईंधन है। नेताजी मंच से चिल्लाते हैं, “हम भ्रष्टाचार जड़ से मिटा देंगे,” और पर्दे के पीछे साहब धीरे से मुस्कुराते हुए पूछते हैं, “सर, पुरानी जड़ों को मिटाकर नई जड़ें कहाँ लगानी हैं?” यह एक ऐसी शानदार जुगलबंदी है जहाँ सुर नेताजी लगाते हैं और ताल पर साहब नाचते हैं, जबकि आम आदमी बेचारा इस शोर में अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए ‘मंजीरा’ बजाता रह जाता है।
इस ‘पावर कपल’ ने भ्रष्टाचार को एक इवेंट मैनेजमेंट बना दिया है। सड़क बनने से पहले ही कमीशन का ‘उद्घाटन’ हो जाता है और पुल गिरने से पहले ही ‘जांच रिपोर्ट’ का ड्राफ्ट तैयार कर लिया जाता है। सच तो यह है कि अब राजनीति और ब्यूरोक्रेसी अलग-अलग पहिए नहीं, बल्कि एक ही गाड़ी के दो स्टीयरिंग हैं, जो गाड़ी को विकास की ओर नहीं, बल्कि अपनी तिजोरियों के ‘प्राइवेट हाईवे’ पर ले जा रहे हैं।

