Hasya Hathauda : भैया, हम कुछ भी खरीदें तो पूछें इंपोर्टेड है क्या? ये बात थी 47-50 की, अब 2026 आ गया, भारत मे उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण हो गया, कितना कुछ बदल गया, पर मस्तिष्क से इंपोर्टेड अब तक नहीं गया, देसी में भरोसा अब तक नहीं लौटा, जूता हो या चश्मा, कपड़ा या मोबाइल, सब मेड इन इंडिया हो गया, लेकिन दिमाग से विदेशी का ख्याल नहीं गया, लगता है हमारे तो डीएनए में इंपोर्टेड घुल गया, हवाई जहाज़ हो, या चाय की प्याली, नाम विदेशी हो तो लगे निराली।
Hasya Hathauda : खून में घुला उधार का विचार, संस्कार हो गए लाचार
देसी जायके की क्या बात, हम ढूंढते हैं विदेशी स्वाद, पैकेटबंद इंपोर्टेड, कल तक सिर्फ सामान था इंपोर्टेड, आज संस्कार भी इंपोर्टेड विदेशी, उधारी की संस्कृति, रील, गेम, वेब, सेब, मेव, पास्ता, पित्जा, नूडल-बिसलरी और कांटे-कटरली, फैशन की लुई विता, गुच्ची, चैनल, प्रादा ही नहीं, H&M, ज़ारा, लेविस, नाइकी, एडीडास मिल जाएंगे सबके पास, स्कोडा, होंडा-हुंडई इंपोर्टेड सबको भा गयी, टाटा, महिंद्रा पास फिर भी नहीं जाती विदेशी की आस, ये सब बाहर से आए, मन के आँगन में अजनबी छाए, बच्चे भूल गए माँ की लोरी, दादी की रुनझुन, मोबाइल की स्क्रीन में कैद हुई जान, रिश्ते बैठे कोने में, चुप और अनजान। इंपोर्टेड कोरियन संस्कृति, भैया अब भारी पड़ने लगी है विदेशी उन्नति।
Hasya Hathauda : गाजियाबाद की वो खबर चीखती है, तीन जिंदगियाँ, जो सवाल पूछती है, किस देश का था वो खेल, वो सपना, पर जवाब में खामोशी, और सिस्टम का रोना, हम बच्चों को देते हैं महंगे गैजेट, खर्च करते हैं बड़ा बजट, नहीं दे रहे संस्कार और समय, कहते हैं सब सीख जाएगा ऑनलाइन, पर भूल गए, संवेदना नहीं आती ऑनलाइन, ये ट्रेडिंग का जमाना, पर जमाने के हाथ में ही तो है पागलखाना, जहाँ लाइक की कीमत जान से भारी और हारने पर जिंदगी लगने लगे बेकारी, हम इंपोर्ट करते हैं हँसी, ग़म और खेल, पर भूल जाते हैं दिल का मशीन से क्या मेल।

Hasya Hathauda : नस-नस में इंपोर्टेड ज़हर, संस्कार पड़े बेहोश
हर विदेशी चीज को मान लिया श्रेष्ठ और अपने मूल्यों दे दिया रेस्ट । संस्कार कोई ऐप नहीं, जो डाउनलोड हो जाए, संस्कृति कोई फ़िल्टर नहीं, जो फेस बदल जाए, ये तो साँसों में घुलती है, संवाद से आती है, इंपोर्टेड स्क्रीन के शोर में आवाज़ दब जाती है।
Hasya Hathauda : अब वक्त है खुद से सवाल पूछने का, क्यों आईने में अपने ही अक्स से डरते हैं, उधार के सपनों में क्यों खोये-खोये से रहते हैं, छोड़ क्यों नहीं देते इंपोर्टेड हम दम, बदल जाएगा जीवन, कश्मीर की वादियों में घूमने जैसा सुकून, ट्यूलिप का गार्डन, बर्फ की सफेद चादर, लगने लगेगा जीवन स्वर्ग से सुंदर ब्रादर।
Hasya Hathauda : पर हर इंपोर्टेड सामान बुरा नहीं, इंपोर्ट रिमोट से दिमाग चलने लगे तब मुश्किल, सुई से जहाज़ तक ठीक है व्यापार, पर ज़िंदगी और भारत के संस्कारों पर रखिए अधिकार, वरना हर रोज़ कोई खबर यूँ ही आएगी और हम जताएंगे सिर्फ अफसोस..फिर इंपोर्टेड की रील चल जाएगी।

