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दीपावली: पटाखे फोड़ने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? जानिए किस राज्य में बनते हैं पटाखे

Farmers got angry when weighing of grains stopped in Harda Mandi, Tehsildar said it is his father's rule.

by: vijay nandan

भोपाल: दीपावली का त्योहार रोशनी, उत्साह और खुशियों का प्रतीक है। घर-घर दीपक जलाने की परंपरा तो प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन दीपावली पर पटाखे फोड़ने की परंपरा उतनी पुरानी नहीं है। यह परंपरा भारत में बारूद के आने के बाद शुरू हुई और धीरे-धीरे त्योहार का अहम हिस्सा बन गई। इतिहासकारों के अनुसार, दीपावली पर पटाखों का चलन मध्यकालीन भारत में आरंभ हुआ। 14वीं से 15वीं सदी के दौरान जब बारूद और आग से चलने वाले उपकरणों का प्रयोग शुरू हुआ, तभी आतिशबाज़ी जैसी चीज़ें भी प्रचलन में आईं। शुरुआत में पटाखों का इस्तेमाल केवल राजाओं के दरबारों और उत्सवों में किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह आम लोगों की दीवाली का हिस्सा बन गया। माना जाता है कि दीपावली पर आतिशबाज़ी फोड़ना ‘अंधकार पर प्रकाश की विजय’ और ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ का प्रतीक माना जाने लगा।

कहाँ बनते हैं सबसे ज्यादा पटाखे

भारत में सबसे ज्यादा पटाखे तमिलनाडु के सिवाकासी शहर में बनाए जाते हैं। यह इलाका देश का “फायरवर्क्स हब” कहलाता है। सिवाकासी में सैकड़ों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जहां देश के करीब 80 से 90 प्रतिशत पटाखे बनाए जाते हैं।
हर साल दीपावली के मौसम में यहां हजारों मजदूर काम में जुटे रहते हैं। सिवाकासी का पटाखा उद्योग करीब ₹6,000 करोड़ का कारोबार करता है और यहां से बने पटाखे देशभर में भेजे जाते हैं।

कहाँ सबसे ज्यादा फोड़े जाते हैं पटाखे

दीपावली पर सबसे ज्यादा पटाखे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में फोड़े जाते हैं। इन राज्यों में आबादी अधिक होने और त्योहारों को बड़े स्तर पर मनाने की परंपरा के कारण आतिशबाज़ी का उपयोग भी अधिक होता है। हालांकि, प्रदूषण और पर्यावरण के खतरे को देखते हुए कई राज्य सरकारें अब ग्रीन पटाखों को बढ़ावा दे रही हैं और पारंपरिक बारूद वाले पटाखों पर सीमाएं लगा रही हैं।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

पटाखे आज भी दीपावली की रौनक बढ़ाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हमें पर्यावरण और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उत्सव मनाना चाहिए। ग्रीन पटाखों और दीप जलाने जैसी परंपराएं इस पर्व की वास्तविक भावना प्रकाश, खुशी और एकता को बनाए रखती हैं। दीपावली पर पटाखे फोड़ने की परंपरा भारत की सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा है, जो समय के साथ बदलती रही है। आज यह त्योहार रोशनी, खुशियों और जिम्मेदारी के संतुलन का प्रतीक बन चुका है।

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