Uttarakhand Glacier Melting: पिघलते ग्लेशियरों ने बढ़ाई चिंता
उत्तराखंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पीछे हट रहे हैं। इसके चलते ग्लेशियरों के आसपास बनने वाली झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि भविष्य में इन ग्लेशियर झीलों के फटने की घटनाएं सामने आ सकती हैं, जिससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़ और बड़े नुकसान का खतरा पैदा हो सकता है।
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान ने ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव और उनसे जुड़े संभावित खतरों को लेकर अहम जानकारी साझा की है।
Uttarakhand Glacier Melting: गढ़वाल-कुमाऊं से लद्दाख तक वैज्ञानिकों की नजर
वैज्ञानिकों के मुताबिक, वाडिया संस्थान की ओर से गढ़वाल, कुमाऊं और लद्दाख क्षेत्र के ग्लेशियरों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। पिंडारी, चौराबाड़ी और डोकरानी ग्लेशियर समेत कई क्षेत्रों में वैज्ञानिक शोध जारी है।
इन अध्ययनों के जरिए ग्लेशियरों की स्थिति, उनके पीछे हटने और पिघलने की गति के साथ-साथ उनसे बनने वाली झीलों में होने वाले बदलावों पर भी नजर रखी जा रही है।
Uttarakhand Glacier Melting: 15 से 20 साल के अध्ययन में सामने आया बदलाव
पिछले करीब 15 से 20 वर्षों के अध्ययन में सामने आया है कि कुमाऊं और गढ़वाल के कई ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और पिघल रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के साथ उनके आसपास बनने वाली झीलों का आकार भी बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियर के पीछे हटने के दौरान वहां जमा होने वाले मलबे यानी मोरेन के कारण पानी जमा होने लगता है और झील का निर्माण होता है। समय के साथ इन झीलों का आकार बढ़ने पर खतरा भी बढ़ सकता है।
Uttarakhand Glacier Melting: झील फटी तो नदियों के आसपास भारी नुकसान की आशंका
वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर भविष्य में किसी ग्लेशियर झील के फटने की घटना होती है तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है। इसका सीधा असर नदियों के बहाव वाले क्षेत्रों और आसपास की आबादी पर पड़ सकता है।
अचानक आने वाली बाढ़ से सड़क, पुल, बस्तियों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान होने की आशंका रहती है। ऐसे में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
Uttarakhand Glacier Melting: उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलें चिन्हित
एनडीएमए और यूएसडीएमए के आकलन में उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को चिन्हित किया गया है। इनमें से 5 झीलों को संभावित रूप से बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा गया है।
इन संवेदनशील झीलों में मवांग और केदारताल समेत अन्य झीलें शामिल हैं। इनकी स्थिति में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी की जा रही है, ताकि संभावित खतरे को समय रहते समझा जा सके।
Uttarakhand Glacier Melting: अर्ली वॉर्निंग सिस्टम से हो रही निगरानी
संभावित आपदा से पहले चेतावनी देने के लिए वाडिया संस्थान की ओर से पिछले वर्ष से अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और निगरानी का काम शुरू किया गया है।
इस व्यवस्था के जरिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में होने वाले बदलावों पर नजर रखने और संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते संबंधित एजेंसियों तक जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का अध्ययन ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों और भविष्य में उनसे जुड़े जोखिमों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।


