Swadesh Ajenad : वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ की वकालत, मोहन भागवत के बयान पर गरमाई सियासत

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Report : Pramod Shrivastava

Swadesh Ajenad : वीर विनायक दामोदर सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न दिए जाने पर देश में व्यापक चर्चा और राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। जिस पर एक बार फिर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। यदि भविष्य में भारत रत्न सावरकर को दिया गया, तो इसके समर्थकों के अनुसार सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है, क्योंकि उनका मानना है कि सावरकर का योगदान महत्वपूर्ण है। वहीं आलोचक इसे राजनीति से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि इतिहास की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही इस तरह के सर्वोच्च सम्मान का निर्णय होना चाहिए।

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अब संघ प्रमुख मोहन भागवत के वकत्व्य के बाद वीर सारवकर को भारत रत्न से नवाजने पर देश में राजनीतिक विचारधाराएं अलग अलग दिशा में हैं। ऐसे में सावरकर को भारत रत्न सम्मान से क्या सम्मान का मान बढ़ेगा। ये बड़ा सवाल है, लेकिन सम्मान से ज़्यादा अब ये सियासत का मुद्दा बन गया है। अब सावरकर को भारत रत्न मिलने को लेकर भविष्य के गर्त में क्या छिपा है, ये तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन सावरकर के सम्मान और भारत रत्न के मान को लेकर जो राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। उस पर हम भी चर्चा करेंगे लेकिन पहले ये रिपोर्ट देख लेते हैं।

Swadesh Ajenad : सावरकर को ‘भारत रत्न’ सम्मान, मिलेगा तो, सम्मान का बढ़ेगा मान’

Swadesh Ajenad : विनायक दामोदर सावरकर याने वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बात पर देश में एक बार फिर सियासी घमासान तेज हो गया है। इस हालिया विवाद की मुख्य वजह है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ताजा बयान । रविवार 8 फरवरी को मुंबई में आरएसएस के शताब्दी समारोह के दौरान, मोहन भागवत ने कहा कि यदि सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो इससे इस पुरस्कार की प्रतिष्ठा और गौरव बढ़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि सावरकर पहले से ही करोड़ों लोगों के दिलों के सम्राट हैं और उन्हें इस सम्मान की प्रतीक्षा नहीं है। लेकिन भागवत के बयान के बाद वीर सावरकर को भारत रत्न सम्मान को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने अपने तर्क हैं, बयान हैं, और दलीलें।

बीजेपी और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों की तरफ से लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि वीर सावरकर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया जाए। बीजेपी और आरएसएस का मानना है कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। जिन्होंने देश के लिए काला पानी की सजा काटी। उन्हें सम्मान देना उनकी विचारधारा का सम्मान है। सावरकर को भारत रत्न देने की पहली औपचारिक सिफारिश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान की गई थी। जो आज भी की जा रही है। साल 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सावरकर को भारत रत्न दिलाने का वादा किया था। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

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Swadesh Ajenad : वहीं कांग्रेस और विपक्षी दल इस मांग का विरोध करते हैं और सावरकर की भूमिका को लेकर अलग नजरिया रखते हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वीर सावरकर को भारत रत्न किस बात के लिये दिया जाना चाहिए। जिन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी और अखंड भारत को खंड खंड करवा दिया। कांग्रेस का कहना है कि भारत रत्न चुनिंदा लोगों को दिया जाता है भाजपा की सरकारों ने इसका राजनीतिकरण कर दिया है।

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Swadesh Ajenad : शिवसेना यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं कि 2014 से मोदी जी की सरकार है अब तक क्यों नहीं दिया। जब जब भारत रत्न देने की बात आती है उनको दर किनार कर दिया जाता है। तो वहीं आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि क्या भारत रत्न आज तक गौरव की प्रतिक्षा कर रहा है। आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर रावण ने कहा कि बताने या पूछने की क्या जरूरत है भागवत जी कहेंगे कि वीर सावरकर को भारत रत्न देना है तो कौन मना करेगा।

Swadesh Ajenad : सम्मान से ज़्यादा, अब सियासत का मुद्दा

Swadesh Ajenad : अब सावरकर को भारत रत्न देने पर सियासी बयान जो भी हों लेकिन असल लड़ाई सावरकर के नाम पर नहीं, विचारधारा की विरासत पर है। बीजेपी सावरकर को राष्ट्रवादी नायक के रूप में स्थापित करना चाहती है। तो वहीं कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई का नैरेटिव गांधी-नेहरू धारा के इर्द-गिर्द रखना चाहती है। आज सवाल यह नहीं रह गया कि सावरकर का योगदान क्या था, बल्कि सवाल यह है कि उनके नाम से किसे सियासी फायदा होगा और किसे नुकसान।

मुद्दा अब सिर्फ सम्मान का नहीं, बल्कि इतिहास, विचारधारा और वोट बैंक की राजनीति से गहराई से जुड़ा है। वीर सावरकर और भारत रत्न…. सम्मान से ज़्यादा, सियासत का मुद्दा बन चुका है। बहरहाल अब देश की राजनीति में एक बार फिर वीर विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है, ऐसे में देखना ये होगा सम्मान की सियासत और सियासत की तपिश कितना जोर पकड़ती है।

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