Swadesh Agenda: मिडिल ईस्ट में बढ़े तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच हुई अहम शांतिवार्ता बेनतीजा साबित हुई है। लंबे समय से जारी कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और सख्त रुख के चलते कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। ईरान अपने परमाणु अधिकारों पर अड़ा रहा, जबकि अमेरिका ने सख्त शर्तों से पीछे हटने के संकेत नहीं दिए। ऐसे में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इस अहम बातचीत का नाकाम होना पाकिस्तान के लिए भी एक कूटनीतिक झटका है। साथ ही पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए भी एक बुरी खबर। दरअसल पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच फंसा हुआ है। वह अमेरिका पर वित्तीय मदद और सुरक्षा संबंधों के लिए निर्भर है। तो वहीं ईरान उसका खास पड़ोसी है।
ईरान के साथ किसी भी टकराव से दाने दाने को मोहताज पाकिस्तान दशकों पीछे जा सकता है। अब पाकिस्तान की जमीन पर अमेरिका और ईरान की शांति वार्ता बेनतीजा रही, इससे पाकिस्तान के अरमानों पर पानी फिर गया, अमेरिका-ईरान वार्ता फेल होने से पड़ोसियों पर धाक जमाने का शहबाज शरीफ का सपना टूट गया। अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता विफल होने का मतलब साफ है कि टकराव का खतरा बढ़ गया है।अगर हालात बिगड़ते हैं तो पूरा मिडिल ईस्ट अस्थिर होगा, जिसका असर सबसे ज्यादा पाकिस्तान की सुरक्षा और रणनीति पर पड़ेगा।
ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच 2 हफ्ते के अस्थायी सीजफायर समझौते के बाद भी मिडिल ईस्ट में तनाव जारी है। यह युद्धविराम मुख्य रूप से होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए था, लेकिन लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल के हमले जारी हैं और कुवैत में ड्रोन हमले भी हुए हैं। जिससे शांति समझौते पर संकट मंडराता रहा, ऐसे में ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 21 घंटे चली शांति वार्ता बेनतीजा रही। बातचीत के दौरान दोनों के बीच होर्मुज स्ट्रेट खोलने और न्यूक्लियर प्रोग्राम पर पेंच फंसा रहा।
कूटनीतिक स्तर पर उम्मीदें थीं कि हालात में कुछ नरमी आएगी, लेकिन अब वार्ता के विफल होने से क्षेत्र में अस्थिरता और गहराने के संकेत मिल रहे हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हमें पूरी तरह भरोसा चाहिए कि ईरान न तो परमाणु हथियार बनाएगा और न ही ऐसी तैयारी करेगा, जिससे वह जल्दी हथियार बना सके। उधर ईरानी डेलीगेशन को लीड कर रहे मोहम्मद बागेर गालिबाफ की प्रतिक्रिया भी सामने आई, कहा कि वार्ता से पहले, इस बात पर ज़ोर दिया कि हमारे पास सद्भावना और इच्छाशक्ति है, लेकिन पिछले दो युद्धों के अनुभवों के कारण, हमें विरोधी पक्ष पर भरोसा नहीं है। और वार्ता में विरोधी पक्ष ईरानी प्रतिनिधिमंडल का विश्वास जीतने में विफल रहा।
इस वार्ता में खुद को अहम मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान अब असहज स्थिति में है। वार्ता विफल होने से इस्लामाबाद की कूटनीतिक साख पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहवाज शरीफ की क्षेत्रीय मामलों में ‘चौधराहट’ दिखाने की उसकी कोशिशों को भी करारा झटका माना जा रहा है। दरअसल ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को क्षेत्रीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता नजर आया, लेकिन वार्ता विफल होने के बाद उसकी भूमिका सीमित होती दिख रही है। इस स्थिति का असर उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ सकता है, खासकर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ, जहां वह अपेक्षित मजबूती हासिल नहीं कर पाएगा। पाकिस्तान के ईरान के साथ पारंपरिक संबंध हैं, वहीं वह अमेरिका के साथ भी संतुलन बनाए रखना चाहता है, लेकिन दोनों के बीच टकराव उसे एक जटिल कूटनीतिक स्थिति में डाल सकता है।
इसके अलावा, चीन और खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के आर्थिक और सामरिक रिश्ते भी इस अस्थिरता से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे उस पर आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है। ईरान-पाकिस्तान सीमा पहले से ही संवेदनशील मानी जाती है, ऐसे में तनाव बढ़ने पर सीमा पर गतिविधियां तेज हो सकती हैं, जिससे आतंकी घटनाओं और घुसपैठ का खतरा भी बढ़ जाएगा, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।
यदि हालात युद्ध की ओर बढ़ते हैं, तो पाकिस्तान पर यह दबाव भी बढ़ेगा कि वह किस पक्ष का समर्थन करता है। किसी भी गलत या असंतुलित कदम से उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंच सकता है और आर्थिक सहायता पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अब अमेरिका ईरान वार्ता विफल होने के बाद क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ सकती हैं। ईरान-इजराइल के बीच अप्रत्यक्ष टकराव तेज हो सकता है। अमेरिका की रणनीति और सख्त हो सकती है। ऐसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहवाज शरीफ के साथ ही सेना प्रमुख असीफ मुनीर की टेंशन बढ़ी हुई है। क्योंकि क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सीधा असर पाकिस्तान की सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति पर पड़ेगा। खासकर अफगानिस्तान और ईरान से सटी सीमाओं पर हालात और जटिल हो सकते हैं। कहा जा सकता है कि शाहवाज शरीफ की होशियारी ने पाकिस्तान के सामने न केवल संकट खड़ा कर दिया है बल्कि पाक को सुरक्षा, कूटनीति और आंतरिक स्थिरता तीनों मोर्चों पर विकट स्थिति में ला खड़ा किया है।
अब इस्लामाबाद में अमेरिका का ईरान के साथ बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। जिसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज स्ट्रेट पर बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। ईरान के उप संसद अध्यक्ष हाजी बाबाई ने कहा है कि यह स्ट्रेट ईरान के कंट्रोल में है। उन्होंने इसे तेहरान की रेड लाइन बताया और कहा कि यहां से गुजरने वाले जहाजों को ईरानी करेंसी रियाल में टोल देना होगा। इससे पहले शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया था कि अमेरिका इस रास्ते से बिछी बारूदी माइंस हटा रहा है। उन्होंने कहा था कि यह समुद्री रास्ता जल्द ही खुल जाएगा। अमेरिकी सेना ने भी दावा किया था कि उनके जहाज इस रास्ते से गुजर चुके हैं।
अमेरिका-ईरान वार्ता का फेल होना सिर्फ दो देशों का मसला नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है। सीजफायर फिलहाल कागज़ों तक सीमित नजर आ रहा है। जब तक तीनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी दूर नहीं होती और जमीनी स्तर पर हिंसा नहीं रुकती, तब तक शांति की उम्मीद कमजोर ही बनी रहेगी। अब शांतिवार्ता का विफल होना केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व के लिए नए संकट की आहट है।वार्ता की विफलता का असर सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के बीच बन रहे समीकरणों पर पड़ा है। ऐसे पाकिस्तान के लिए यह बड़ा संकेत है कि वैश्विक राजनीति और रणनीति में प्रभाव बढ़ाने की अपनी कोशिशों से पहले उसको अपनी स्थिति और परिस्थिति को जरूर देख लेना चाहिए।।।
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