रिपोर्ट – सुमित कुमार मेहरा
Raisen: विश्वभर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश देने वाले आचार्य रजनीश ओशो का 95वां जन्मोत्सव रायसेन जिले के ग्राम कुचवाड़ा स्थित ओशोधाम आश्रम में उत्साह और भक्ति के साथ मनाया गया। 11, 12 और 13 दिसंबर को चलने वाले इस तीन दिवसीय उत्सव में देश–विदेश से आए भक्त बड़ी संख्या में शामिल हुए। तीन वर्ष बाद ओशो के जन्मस्थान ‘ओशो हाउस’ को भी इस अवसर पर खोल दिया गया, जिससे अनुयायियों में विशेष उत्साह देखा गया।
ओशो के जन्मस्थान पर विशेष आयोजन
ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को रायसेन जिले की उदयपुरा तहसील के छोटे से गांव कुचवाड़ा में ननिहाल में हुआ था। बचपन के शुरुआती सात वर्ष यहीं बीते, जिसके बाद परिवार नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा चला गया। ओशो ने अपने जीवन में ज्ञान, स्वच्छंदता और स्वतंत्र सोच का जो संदेश दिया, उसने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई।
जन्मोत्सव के दौरान ओशो के शिष्यों ने भजन और गीतों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी। जापान, गुजरात, दिल्ली और रायपुर से आए भक्तों ने कहा कि कुचवाड़ा उनके लिए किसी तीर्थ से कम नहीं, क्योंकि यही ‘ओशो का स्वर्ग’ माना जाता है।
ओशो तीर्थ आश्रम की भूमिका
कुचवाड़ा में बना भव्य ‘ओशो तीर्थ आश्रम’ जापान के स्वामी सत्यतीर्थ भारती द्वारा स्थापित किया गया था। उनके बाद आश्रम की जिम्मेदारी उनकी पत्नी मां पात्रा संभाल रही हैं। उनके अथक प्रयासों से यह आश्रम विशाल और सुव्यवस्थित स्वरूप में दिखाई देता है। जन्मोत्सव के दिनों में आश्रम को विशेष रूप से सजाया गया और ध्यान कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
जन्मस्थली की उपेक्षा: तीर्थ बनने का सपना अधूरा
हालांकि एक ओर जहां आश्रम में भव्य आयोजन हुआ, वहीं दूसरी ओर ओशो के वास्तविक जन्मस्थान की बदहाल स्थिति ने भक्तों और ग्रामीणों को निराश किया।
करीब 150 साल पुराने इस घर की दीवारें टूटने की कगार पर हैं। खिड़कियों की जालियों पर जंग लग गया है। घर के सामने नालियों का गंदा पानी बहता है और आसपास कचरे का ढेर जमा है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां आध्यात्मिक पर्यटन विकसित करने की कई घोषणाएं हुईं, परंतु वास्तविकता में कोई ठोस कार्य नहीं किया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ समय पहले यहां सीसी सड़क तो बन गई, लेकिन नियमित सफाई की व्यवस्था न होने से हालात जस के तस बने हुए हैं। घर के सामने लगी लाइट भी कोई चुरा ले गया। आश्रम प्रबंधन ने जन्मस्थान को ताले में बंद रखा है और आम लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं है, जिससे नाराजगी बढ़ती जा रही है। गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
ओशो का संदेश, लेकिन पालन कौन करे?
ओशो कहते थे— “अपनी जिंदगी में जो करना चाहते हैं, वह करें। लोग तब भी कुछ कहते हैं, जब आप कुछ नहीं करते।”
उनकी यह सीख आज भी विश्वभर में प्रेरणा देती है, लेकिन उनका जन्मस्थान स्वयं उपेक्षा का शिकार है।
जन्मोत्सव के अवसर पर जहां हजारों भक्त ओशो के विचारों को याद कर रहे थे, वहीं जर्जर घर और गंदगी से भरी गलियां यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या ओशो के गांव को वह सम्मान मिल रहा है, जिसके वह हकदार हैं?
कुचवाड़ा के लोगों और भक्तों की उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन इस आध्यात्मिक धरोहर को संरक्षित कर इसे विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए ठोस पहल करेगा।





