Indian Mother Tongues Digital : मातृभाषाओं के संरक्षण में परिवार, समाज और मीडिया की अहम भूमिका
Indian Mother Tongues Digital : भोपाल के भारत भवन में आयोजित ‘भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान’ के दूसरे दिन मातृभाषाओं के संरक्षण, डिजिटल तकनीक और बदलती पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के अंतर्गत वीर भारत न्यास एवं संस्कृति संचालनालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में ‘डिजिटल युग में मातृभाषाएँ : संकट, संभावना और नई पत्रकारिता’ विषय पर सत्र आयोजित किया गया।
सत्र में वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषाओं को बचाना केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, मीडिया और नई पीढ़ी को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी। डिजिटल तकनीक का सकारात्मक इस्तेमाल भारतीय भाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ने और उनके विस्तार का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

Indian Mother Tongues Digital : अजय बोकिल बोले- मातृभाषा हमारी भावनाओं और आत्मा से जुड़ी है
‘सुबह सवेरे’, भोपाल के कार्यकारी प्रधान संपादक अजय बोकिल ने कहा कि मातृभाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की भावनाओं, संस्कारों और आत्मा से गहराई से जुड़ी होती है। बचपन में मां और परिवार से मिलने वाली भाषा में एक अलग तरह की आत्मीयता, खूबसूरती और संवेदना होती है।
उन्होंने कहा कि आज कई परिवारों में बच्चों से मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी में बातचीत करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह भारतीय मातृभाषाओं के संरक्षण के सामने एक बड़ी चुनौती है। मातृभाषा को बचाने का पहला कदम घर से ही उठाना होगा। माता-पिता को बच्चों से अपनी मातृभाषा में संवाद करना चाहिए और उन्हें बचपन से ही अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ना चाहिए।
Indian Mother Tongues Digital : साइबर ठगी का उदाहरण देकर समझाया मातृभाषा का महत्व
अजय बोकिल ने अपने साथ हुई साइबर ठगी की एक घटना का उदाहरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक ठग ने उनके बेटे के नाम पर उनसे बातचीत करने की कोशिश की थी। जब ठग ने हिंदी में बात की तो उन्हें तुरंत शक हो गया, क्योंकि उनके बेटे से उनकी बातचीत सामान्य तौर पर मराठी में होती है।
उन्होंने कहा कि मातृभाषा सिर्फ पारिवारिक और भावनात्मक रिश्तों को मजबूत नहीं करती, बल्कि कई परिस्थितियों में यह हमारी पहचान और एक-दूसरे को पहचानने का आधार भी बन सकती है।
Indian Mother Tongues Digital : अब्दुल वदूद साजिद बोले- भाषा से गफलत हुई तो सभ्यता से दूरी बढ़ेगी
इंकलाब उर्दू दैनिक, दैनिक जागरण समूह के अब्दुल वदूद साजिद ने कहा कि यदि समाज अपनी मातृभाषा के प्रति उदासीन हो गया तो इसका असर उसकी सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ सकता है। उन्होंने हिंदी और उर्दू के आपसी संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों भाषाओं के बीच लंबे समय से गहरा रिश्ता और निरंतर शब्दों एवं भावों का आदान-प्रदान रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत की भाषाएँ एक-दूसरे से शब्द, विचार और भाव ग्रहण करके समृद्ध हुई हैं। इसलिए भाषाई विविधता को अलगाव के बजाय संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रूप में देखने की जरूरत है।
Indian Mother Tongues Digital : डिजिटल युग में मातृभाषाओं के सामने चुनौती के साथ अवसर भी
अब्दुल वदूद साजिद ने कहा कि डिजिटल तकनीक के विकास ने भारतीय भाषाओं के सामने कुछ नई चुनौतियाँ जरूर खड़ी की हैं, लेकिन इसके साथ कई संभावनाएँ भी पैदा हुई हैं। जरूरत इस बात की है कि तकनीक को नकारात्मक नजरिए से देखने के बजाय उसका सकारात्मक और रचनात्मक इस्तेमाल किया जाए।
उन्होंने डिजिटल दौर में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर भी बात की। उनके मुताबिक सोशल मीडिया और इंटरनेट ने हर व्यक्ति को सूचना प्रसारित करने का माध्यम उपलब्ध करा दिया है, लेकिन पत्रकारिता में सत्यापन, जिम्मेदारी और नैतिकता के मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं होना चाहिए।
Indian Mother Tongues Digital : तेज खबरों के दौर में विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे जरूरी
साजिद ने कहा कि डिजिटल माध्यमों ने खबरों की गति को काफी बढ़ा दिया है, लेकिन खबर कितनी तेजी से पहुंचती है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह कितनी विश्वसनीय है। पत्रकारिता में तथ्यों के सत्यापन और जिम्मेदारी का महत्व डिजिटल दौर में और बढ़ गया है।
उन्होंने मशीन आधारित अनुवाद की चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि डिजिटल तकनीक ने अलग-अलग भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाया है, लेकिन कई बार शाब्दिक अनुवाद से अर्थ बदल जाता है और हास्यास्पद स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए तकनीक के साथ भाषा की संवेदना, संदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ को समझना जरूरी है।
Indian Mother Tongues Digital : समुद्रगुप्त कश्यप ने असमिया कविता से बताई भारतीय भाषाओं की ताकत
वरिष्ठ पत्रकार समुद्रगुप्त कश्यप ने अपने वक्तव्य की शुरुआत असमिया भाषा की करीब 500 वर्ष पुरानी कविता के पाठ से की। उन्होंने बताया कि यह कविता श्रीमंत शंकरदेव की रचना है, जिसमें भारतभूमि की महत्ता और भारत में मानव जन्म को सौभाग्य के रूप में बताया गया है।
उन्होंने कहा कि श्रीमंत शंकरदेव अपने समय के प्रभावी संचारक थे। उन्होंने कविता, गीत, नाटक, नृत्य, अभिनय और चित्रकला सहित उस दौर में उपलब्ध विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल समाज तक अपनी बात पहुंचाने के लिए किया। उनके अनुसार यह परंपरा आज के डिजिटल युग में भी प्रासंगिक है और भारतीय भाषाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए नए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
Indian Mother Tongues Digital : मातृभाषा के प्रति सम्मान सिर्फ भावना नहीं, व्यवहार में भी दिखना चाहिए
समुद्रगुप्त कश्यप ने बताया कि उनकी मातृभाषा असमिया है, लेकिन उन्हें स्कूल और कॉलेज में असमिया भाषा में पढ़ाई करने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि किसी भाषा के प्रति सम्मान केवल भावनात्मक स्तर पर नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका असर हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने भाषाओं के संरक्षण के साथ-साथ शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
Indian Mother Tongues Digital : नागालैंड का उदाहरण देकर समझाई भाषाई विविधता
कश्यप ने नागालैंड के भाषाई परिदृश्य का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां 18 अलग-अलग जनजातियां हैं और कई जनजातियों के लोग एक-दूसरे की भाषाओं को नहीं समझते। इसके बावजूद आपसी संपर्क और संवाद के कारण एक नई भाषा का विकास हुआ, जिस पर असमिया के साथ हिंदुस्तानी के शब्दों का भी प्रभाव दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बड़ी ताकत है। भारतीय भाषाएँ सदियों से एक-दूसरे के संपर्क में रही हैं और उन्होंने एक-दूसरे से शब्द, भाव, विचार और सांस्कृतिक अनुभव ग्रहण कर खुद को समृद्ध किया है।
Indian Mother Tongues Digital : डिजिटल माध्यमों से नई पीढ़ी तक पहुंचें भारतीय भाषाएँ
वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा समय में भारतीय भाषाओं और मातृभाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल माध्यम भारतीय भाषाओं के प्रसार के साथ-साथ उनके बीच संवाद को भी मजबूत कर सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला ने किया। सत्र में ‘सुबह सवेरे’, भोपाल के कार्यकारी प्रधान संपादक अजय बोकिल, इंकलाब उर्दू दैनिक, दैनिक जागरण समूह के अब्दुल वदूद साजिद और वरिष्ठ पत्रकार समुद्रगुप्त कश्यप ने मातृभाषा, भाषाई विविधता, डिजिटल तकनीक और नई पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे।
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