Hasya Hathauda : भैया, देश में एक नया राष्ट्रीय खेल चल रहा है, मुनाफाखोरी यानि आम आदमी से खूब मुनाफा वसूलो, इस खेल के खिलाड़ी हैं, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और रेफरी है…चुप्पी, आम आदमी दर्शक नहीं, मैदान है, जिस पर सब खेलते हैं। वैसे इस खेल के और भी नाम है, अत्यधिक लाभखोरी, शोषण, अनुचित मुनाफा, कालाबाजारी।
Hasya Hathauda : सबसे पहले स्वास्थ्य को लीजिए। पहले बीमारी आती थी, अब बिल पहले आ जाता है, बीमारी बाद में कन्फर्म होती है। डॉक्टर साहब कहते हैं जांच करानी पड़ेगी। जांच कहती है, एक और जांच करानी पड़ेगी और अंत में रिपोर्ट कहती है, सब नार्मल है, पर बिल असामान्य है। सरकारी अस्पताल में लाइन इतनी लंबी कि बीमारी ठीक हो जाए, नंबर आने से पहले। निजी अस्पताल में इलाज फाइव-स्टार, बिल सिक्स-स्टार, आम आदमी के लिए बीमार होना पाप और अपराध है।
Hasya Hathauda : अब शिक्षा की तरफ आइए। पहले कहा जाता था, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, अब हालात ऐसे हैं कि पढ़ते-पढ़ते बाप किसान से फाइनेंसर बन जाता है। स्कूल की फीस इतनी कि बच्चा नहीं, EMI पैदा होती है। किताबें हर साल नई, ज्ञान वही, कवर बदला, कीमत दोगुनी। कोचिंग वाले कहते हैं, भविष्य संवार देंगे और भविष्य कहता है, पहले फीस भरो, डिग्री मिलती है, नौकरी नहीं, लेकिन संस्थान का मुनाफा ज़रूर टॉपर रहता है।
Hasya Hathauda : खेती तो अब हास्य नहीं, करुणा का विषय है। किसान बीज खरीदे, खाद खरीदे, दवा (पेस्टिसाइड) खरीदे, डीज़ल खरीदे, सब बाजार भाव पर। लेकिन जब फसल बेचने जाए तो भाव सुनकर लगता है, जैसे फसल नहीं, फोटो बेच रहा हो। मंडी में दलाल कहते हैं, रेट यही है, किसान कहता है, खर्च तो ज्यादा है, जवाब मिलता है, तो खेती क्यों की? यानी गलती किसान की है कि उसने सबका पेट भरने की कोशिश की। कर्जमाफी की घोषणा होती है, पर कर्ज किसान से ज्यादा भाषणों का उतरता है।

Hasya Hathauda : अब महंगाई, डायन नहीं, अब पूरी बारात लेकर आई है। टमाटर हर कभी लाल पीला हो जाता है, सोना-चांदी की मत पूछो, आम आदमी नाम भूलता जा रहा है, दाल इतनी महंगी कि दाल-रोटी का रिश्ता लॉन्ग डिस्टेंस होता जा रहा है । पेट्रोल इतना महंगा कि बाइक नहीं, अब भावनाएं चलती हैं। गैस सिलेंडर देख कर गृहिणी ऐसे देखती है जैसे कोई एक्स-रिलेशनशिप की जरूरत भी है, दर्द भी।
Hasya Hathauda : हर जगह मुनाफाखोरी का बोर्ड टंगा है, यहाँ आम आदमी कुचला जाता है। टैक्स ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर, और ऊपर वालों के लिए नीचे। आम आदमी हर बजट में खोजता है, मेरा क्या? जवाब मिलता है, आप धैर्य रखिए।
Hasya Hathauda : नतीजा ये है कि आम आदमी अब सपने नहीं देखता, ऑफर देखता है। इलाज से पहले डिस्काउंट पूछता है, पढ़ाई से पहले पैकेज, खेती से पहले बीमा और जब सब कुछ लुट जाता है, तो कहा जाता है, देश आगे बढ़ रहा है। सवाल बस इतना है, देश आगे बढ़ रहा है, पर आम आदमी क्यों वहीं खड़ा है… जेब खाली, उम्मीद उधार और मुनाफा किसी और का ?

