Hasya Hathauda 09 भैया, अमेरिका आर्थिक रूप से जितना विकसित है, उतना ही नागरिक बोध यानी सिविक सेंस के मामले में आगे है। वहां सिविक सेंस सभ्य समाज की पहचान है, जबकि हमारे यहां… उसे अक्सर नागरिक अधिकार समझ लिया जाता है। मतलब नियम तोड़ना भी अधिकार, और टोको तो लोकतंत्र खतरे में आ जाता है !
Hasya Hathauda 09 : अमेरिका में ट्रैफिक सिग्नल पर रेड लाइट दिखते ही लोग ऐसे रुकते हैं, जैसे बचपन की कोई कसम याद आ गई हो। पैदल यात्री सड़क पर उतरे नहीं कि गाड़ी अपने आप ब्रेक लगा लेती है। लेकिन भैया, अपने देश में रेड सिग्नल कोई कानून नहीं, बल्कि सजावटी लैंप है।
ग्रीन लाइट गाड़ियों के लिए होती है, लेकिन पैदल यात्री उसे देखकर सोचते हैं, अब नहीं जाएंगे तो कब जाएंगे? आपका हमारा ऐसे लोगो से रोज वास्ता पड़ता है, वो हाथ देकर वाहनों को रोकते हैं।

Hasya Hathauda 09 : अमेरिका में पुलिस न भी हो, तब भी नियम नहीं टूटते। हमारे यहां पुलिस खड़ी हो, फिर भी नियम ऐसे कुचले जाते हैं, जैसे गेंहूं पीस रहे हों और अगर पुलिस ने टोका तो तुरंत संविधान याद आ जाता है, मेरा अधिकार है !
अमेरिका में लोग दूसरों की निजता का सम्मान करते हैं, वहां किसी के घर में झगड़ा हो जाए तो पड़ोसी दरवाज़ा बंद कर लेते हैं। हमारे यहां झगड़ा हो तो पूरा मोहल्ला ऐसे इकट्ठा होता है जैसे फ्री का वेब सीरीज लाइव चल रहा हो। कोई मोबाइल से वीडियो बना रहा होता है, कोई सलाह दे रहा है, और कोई कह रहा है अरे, पहले भी इनके यहां ऐसा हुआ था…
Hasya Hathauda 09 : अब बात करते हैं साफ-सफाई की।
भारत में स्वच्छता अभियान चला, लोगों ने सीखा, घर साफ रखो, और कचरा बाहर फेंको। सुबह-सुबह कचरे की गाड़ी हर गली में हॉर्न बजाती है, फिर भी कुछ लोग कचरा ऐसे फेंकते हैं, जैसे सड़क उनकी निजी डस्टबिन हो।
अमेरिका में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना गंभीर अपराध है। लोग मानते हैं ये सरकार की नहीं, जनता की संपत्ति है। और भारत में?
कभी ट्रेन से सफर कीजिए। सीट पर पान की पीक, खिड़की पर नाम-प्रेमिका का शिलालेख, और टॉयलेट की दीवार पर महान वाक्य, यहां XYZ आया था।
पार्क में पिकनिक मनाने के बाद बचा खाना, प्लेट, पन्नी, सब वहीं छोड़ देना भी हमारा अधिकार है।और सार्वजनिक शौचालय ?
भैया, वो तो सरकार के लिए बनाए गए हैं। हम भारतीयों की पसंद तो आज भी दीवार, सड़क किनारा और खुला मैदान ही है।
हां, ये भी सच है कि अमेरिका में भी सब फरिश्ते नहीं हैं। वहां भी अपराध होते हैं, समस्याएं हैं। लेकिन शिक्षा, कानून का डर और सामाजिक संस्कार लोगों को लाइन में रखता है और यहां लाइन में लगना ही सबसे बड़ी सजा है।
Hasya Hathauda 09 : अब सवाल ये है, क्या हमारे देश में कानून का पालन नहीं करवाया जाता है? या फिर हम ही पालन नहीं करना चाहते? आख़िर में बस इतना ही कहना है, विकसित समाज सिर्फ फ्लाईओवर, मेट्रो और मॉल से नहीं बनता, विकसित समाज बनता है, जिम्मेदार नागरिकों से।
बस भैया, सवाल यही है, हम भारत के लोग कब जिम्मेदार नागरिक बनेंगे?
(ये हास्य हथौड़ा एक NRI से बातचीत पर आधारित है…)

