CJI संजीव खन्ना पर निशिकांत दुबे का हमला: गृह युद्ध का आरोप, बीजेपी ने क्यों बनाई दूरी?

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बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने CJI संजीव खन्ना और सुप्रीम कोर्ट पर गृह युद्ध भड़काने

आज हम बात करेंगे एक ऐसे मुद्दे की, जो भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के बीच तनाव का कारण बन रहा है। यह मामला है बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के उस बयान का, जिसमें उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना पर गंभीर आरोप लगाए। निशिकांत दुबे ने कहा कि देश में होने वाले गृह युद्ध और धार्मिक तनाव के लिए CJI संजीव खन्ना और सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार हैं। लेकिन बीजेपी ने खुद को इस बयान से अलग कर लिया है। आखिर क्या है इस विवाद की जड़? और क्यों यह मामला इतना गरमा रहा है? चलिए, इसे डिटेल में समझते हैं।


क्या है पूरा मामला?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्देश दिया, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रपति को किसी विधेयक (बिल) पर फैसला लेने के लिए एक समय सीमा तय करनी होगी। यह निर्देश 8 अप्रैल 2025 को CJI संजीव खन्ना की अगुवाई वाली बेंच ने दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल के पास विधेयकों को रोकने की कोई असीमित शक्ति (वेटो पावर) नहीं है। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया।

इस निर्देश का संबंध वक्फ कानून से भी है। वक्फ कानून को संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन इस पर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। कोर्ट के इस फैसले ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को भड़का दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और CJI पर निशाना साधते हुए कहा कि कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है और देश में गृह युद्ध और धार्मिक तनाव भड़काने के लिए जिम्मेदार है।


निशिकांत दुबे ने क्या कहा?

निशिकांत दुबे ने अपने बयान में कहा:

  • “देश में होने वाले सभी गृह युद्धों के लिए CJI संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं।”
  • “सुप्रीम कोर्ट धार्मिक युद्ध भड़काने का काम कर रहा है।”
  • “अगर हर मामले में सुप्रीम कोर्ट को जाना पड़े, तो संसद और विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए।”
  • “राष्ट्रपति CJI की नियुक्ति करते हैं, संसद कानून बनाती है। फिर कोर्ट कैसे चुने हुए लोगों को निर्देश दे सकता है? कोर्ट ने कौन सा कानून बनाया कि राष्ट्रपति को 3 महीने में फैसला लेना होगा?”

इन बयानों ने न सिर्फ सियासी हलकों में हलचल मचाई, बल्कि विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, ने भी बीजेपी पर हमला बोला। लेकिन बीजेपी ने तुरंत निशिकांत दुबे के बयान से दूरी बना ली और कहा कि यह उनका निजी विचार है, पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं।


कौन हैं CJI संजीव खन्ना?

संजीव खन्ना भारत के 51वें मुख्य न्यायाधीश हैं। उन्होंने 11 नवंबर 2024 को CJI का पदभार संभाला और वह 13 मई 2025 को रिटायर होंगे। यानी उनका कार्यकाल सिर्फ 6 महीने का है। लेकिन इस छोटे से समय में भी वह कई बड़े और चर्चित मामलों में शामिल रहे हैं।

  • पृष्ठभूमि: संजीव खन्ना का जन्म 14 मई 1960 को दिल्ली में हुआ। उन्होंने 1977 में दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई पूरी की। उनके पिता दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे, और मां लेडी श्रीराम कॉलेज में हिंदी की लेक्चरर थीं।
  • करियर: संजीव खन्ना करीब 14 साल तक दिल्ली हाई कोर्ट में जज रहे। 18 जनवरी 2019 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया।
  • महत्वपूर्ण फैसले:
    • बिलकिस बानो केस: इस मामले में उनकी बेंच ने अहम फैसला सुनाया।
    • अरविंद केजरीवाल की जमानत: उन्होंने दिल्ली के पूर्व CM को जमानत दी।
    • अनुच्छेद 370, इलेक्टोरल बॉन्ड, VVPAT, RTI: ये कुछ ऐसे बड़े मामले हैं, जिनमें वह शामिल रहे।
    • तलाक का अधिकार: 2023 में उनकी बेंच ने फैसला दिया कि संविधान के आर्टिकल 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट सीधे तलाक का आदेश दे सकता है।

विवाद की जड़ क्या है?

इस पूरे विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश से हुई, जिसमें राष्ट्रपति को विधेयकों पर फैसला लेने की समय सीमा तय करने को कहा गया। बीजेपी सांसदों का मानना है कि यह निर्देश संसद और राष्ट्रपति की स्वायत्तता पर हमला है। निशिकांत दुबे का कहना है कि कोर्ट को चुने हुए प्रतिनिधियों को इस तरह के निर्देश देने का अधिकार नहीं है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लटकाए रखना संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास विधेयकों को रोकने की असीमित शक्ति नहीं होनी चाहिए।


इस विवाद से क्या सीख मिलती है?

  1. न्यायपालिका और विधायिका के बीच तनाव: यह विवाद एक बार फिर न्यायपालिका और विधायिका के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर बहस को जन्म दे रहा है। क्या कोर्ट को चुने हुए प्रतिनिधियों को निर्देश देने का अधिकार है? यह सवाल लंबे समय से चर्चा में रहा है।
  2. राजनीतिक बयानबाजी: निशिकांत दुबे का बयान भले ही उनकी निजी राय हो, लेकिन यह दिखाता है कि राजनीतिक दल कैसे संवेदनशील मुद्दों पर बयानबाजी करते हैं और फिर उससे दूरी बना लेते हैं।
  3. संवैधानिक संतुलन: राष्ट्रपति, संसद, और सुप्रीम कोर्ट के बीच शक्तियों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इस तरह के विवाद इस संतुलन को और मजबूत करने की जरूरत को दर्शाते हैं।

आगे क्या?

यह विवाद यहीं खत्म नहीं होने वाला। सुप्रीम कोर्ट में वक्फ कानून पर सुनवाई अभी जारी है, और केंद्र सरकार को जल्द ही जवाब दाखिल करना होगा। दूसरी ओर, निशिकांत दुबे के बयान ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है। विपक्ष इस मुद्दे को बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है, जबकि बीजेपी इस मामले को ठंडा करने की कोशिश में है।

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