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हास्य-हथौड़ा

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padosi-ki-jasoosi : निगरानी लाल जी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ वाले

padosi-ki-jasoosi : भैया, हमारे मोहल्ले में अगर कोई “इंटेलिजेंस ब्यूरो” की अनौपचारिक ब्रांच है, तो वो है, निगरानी लाल जी का घर। जी हाँ, वही निगरानी लाल जी जिनकी खिड़की कभी बंद नहीं होती और जिनकी नजरें CCTV कैमरे से भी तेज काम करती हैं। निगरानी लाल का मानना है

Hasya Hathauda 16

Hasya Hathauda 16 : कुर्सी, करप्शन और ‘साहब’ का टशन !

स्वागत है आपका ‘हास्य हथौड़ा’ के इस ताजा संस्करण में, जहाँ हम मुद्दों को सुलझाते नहीं, बल्कि उन पर व्यंग्य की ऐसी चोट करते हैं कि सिस्टम कराहने लगे। आज बात करेंगे उस अद्भुत प्रेम त्रिकोण की, जिसे दुनिया राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और भ्रष्टाचार के नाम से जानती है। Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 15

Hasya Hathauda 15 ; एक तरफा प्यार, ‘कल्पनाओं का सुपरबाजार’ !

by: vijay nandan Hasya Hathauda भैया 😄 एक तरफा प्यार भी बड़ी कमाल चीज़ होती है। दो तरफा प्यार में तो सामने वाला या वाली भी आई लव यू बोल देता या देती है, लेकिन एक तरफा प्यार में तो आदमी खुद ही सवाल पूछता है, खुद ही जवाब देता

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holi spl hasya hathauda : होली का हुड़दंग, हुलिया और गुझिया…!

by: vijay nandan भैया, होली हमारे देश का ऐसा महान त्योहार है, जिसमें आदमी अपनी असली पहचान भूलकर कई तरह के रूप धारण कर लेता है। कहने को यह रंगों का त्योहार है, लेकिन असल में यह बहुरूपिया दिवस है। सुबह जो व्यक्ति घर से साफ-सुथरे कपड़ों में निकलता है,

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 14 : कमाई की दौड़, रिश्तों की होड़, खुशियों की EMI पर ज़िंदगी !

भैया, ना खुशियाँ खरीद पाया, ना ग़मों का ठेला खोल पाया, फिर भी हर सुबह “सेल” लगा कर कमाने निकल आया। जेब में सपने, माथे पर पसीना, ज़िंदगी बोली, भाई, तू है बड़ा नगीना ! नारी को जो सताए, उसका इतिहास मिट जाए, रावण, कौरव, कंस सबक बन जाए। संत

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 13 : नया खेल मुनाफाखोरी, खिलाड़ी… शिक्षा-स्वास्थ्य और कृषि, रेफरी…चुप्पी !

Hasya Hathauda : भैया, देश में एक नया राष्ट्रीय खेल चल रहा है, मुनाफाखोरी यानि आम आदमी से खूब मुनाफा वसूलो, इस खेल के खिलाड़ी हैं, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और रेफरी है…चुप्पी, आम आदमी दर्शक नहीं, मैदान है, जिस पर सब खेलते हैं। वैसे इस खेल के और भी नाम

Hasya Hathauda

Hasya Hathauda 12 : इंपोर्टेड मानसिकता का असर, संस्कार लकवाग्रस्त !

Hasya Hathauda : भैया, हम कुछ भी खरीदें तो पूछें इंपोर्टेड है क्या? ये बात थी 47-50 की, अब 2026 आ गया, भारत मे उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण हो गया, कितना कुछ बदल गया, पर मस्तिष्क से इंपोर्टेड अब तक नहीं गया, देसी में भरोसा अब तक नहीं लौटा, जूता हो

Hasya Hathauda swadesh news

Hasya Hathauda 11 : महंगाई डायन की डाइटिंग, बेटी को दहेज में ‘सोने का तकिया’ !

Hasya Hathauda : भैया, महंगाई डायन खाय जात है, अब सिर्फ गाने में नहीं, आम आदमी की थाली में बैठ गई है। हर महीने तनखा वही पुरानी, नौ हज़ार आती है और महंगाई डायन पूछती भी नहीं, सीधे खा जाती है। आम आदमी की हालत ऐसी होती जा रही कि

Hasya Hathauda 10

Hasya Hathauda 10 : ‘रील क्रांति’, न कोई गिरफ्तारी, न कोई संघर्ष, न कोई जोखिम !

Hasya Hathauda 10 : भैया, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां क्रांति अब सड़कों पर नहीं, रील्स में होती है। पहले लोग आंदोलन के लिए घर से निकलते थे, अब मोबाइल निकालते हैं। पहले नारे लगते थे, अब कैप्शन लगते हैं और सबसे बड़ी बात क्रांति अब

Hasya Hathauda 09

Hasya Hathauda 09 : हम अमरिकनों से ज्यादा अधिकार संपन्न हैं…!

Hasya Hathauda 09 भैया, अमेरिका आर्थिक रूप से जितना विकसित है, उतना ही नागरिक बोध यानी सिविक सेंस के मामले में आगे है। वहां सिविक सेंस सभ्य समाज की पहचान है, जबकि हमारे यहां… उसे अक्सर नागरिक अधिकार समझ लिया जाता है। मतलब नियम तोड़ना भी अधिकार, और टोको तो