BY
Yoganand Shrivastava
Prayagraj हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई महिला या पुरुष पहले से शादीशुदा है, तो वह अपने जीवनसाथी के जीवित रहते और बिना कानूनी तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता। अदालत ने ऐसे रिश्तों को ‘अवैध’ करार देते हुए उन्हें सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है।

Prayagraj “निजी स्वतंत्रता पूर्ण नहीं, इसकी भी सीमाएं हैं”
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने अंजू और उनके साथी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है, इसलिए पुलिस को उनके जीवन में दखल न देने का निर्देश दिया जाए। इस पर कोर्ट ने कहा कि दो वयस्कों की निजी स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है, जहां दूसरे व्यक्ति (पति या पत्नी) का संवैधानिक और कानूनी अधिकार शुरू होता है।

Prayagraj बिना तलाक सुरक्षा देना कानून का उल्लंघन
Prayagraj अदालत ने सरकारी अधिवक्ता की उस दलील को स्वीकार किया जिसमें कहा गया था कि बिना तलाक के साथ रहना न केवल कानूनी मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि यह दंडात्मक प्रावधानों को विफल करने जैसा है। हाई कोर्ट ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग उन लोगों को सुरक्षा देने के लिए नहीं किया जा सकता, जिनका संबंध कानून की नजर में मान्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सक्षम अदालत से तलाक लिए बिना ऐसे जोड़ों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई रिट जारी नहीं की जा सकती।

Prayagraj पुलिस अधीक्षक से सुरक्षा की अपील का विकल्प खुला
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं के जीवन की सुरक्षा के पहलू को ध्यान में रखते हुए एक विकल्प भी दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को वास्तव में किसी प्रकार की हिंसा या शारीरिक नुकसान की आशंका है, तो वे संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) को विस्तृत प्रार्थना पत्र दे सकते हैं। संबंधित अधिकारी मामले की जांच कर कानून के दायरे में रहते हुए आवश्यक कदम उठा सकेंगे। लेकिन, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस सुरक्षा का अर्थ उनके ‘लिव-इन संबंध’ को कानूनी मान्यता देना कतई नहीं होगा।





