CMR Delivery Delay Haryana : फतेहाबाद के टोहाना में कस्टम मिल्ड राइस (CMR) की डिलीवरी और स्वीकृति में हो रही देरी को लेकर राइस मिलर्स एसोसिएशन ने चिंता जताई है। फतेहाबाद राइस मिलर्स एसोसिएशन ने राज्यसभा सदस्य सुभाष बराला को पत्र सौंपकर भारतीय खाद्य निगम (FCI) के स्तर पर लंबित 6.94 लाख मीट्रिक टन CMR की तत्काल स्वीकृति कराने की मांग की है।
मिलर्स का कहना है कि धान की मिलिंग का काम पूरा होने के बावजूद तैयार चावल की डिलीवरी और स्वीकृति में देरी होने से उनकी कार्यशील पूंजी फंस रही है। इसके साथ ही स्टॉक के लंबे समय तक पड़े रहने से गुणवत्ता और आर्थिक नुकसान की आशंका भी बढ़ रही है।
CMR Delivery Delay Haryana: 6.94 लाख मीट्रिक टन CMR अभी लंबित
एसोसिएशन के अनुसार खरीफ विपणन सीजन 2025-26 में हरियाणा की करीब 1,400 राइस मिलों को कुल 62.12 लाख मीट्रिक टन धान आवंटित किया गया था। इसके बदले लगभग 41.62 लाख मीट्रिक टन CMR भारतीय खाद्य निगम को दिया जाना था।
मिलर्स के मुताबिक अब तक करीब 34.68 लाख मीट्रिक टन CMR जमा कराया जा चुका है, जबकि लगभग 6.94 लाख मीट्रिक टन CMR की डिलीवरी और स्वीकृति अभी बाकी है। एसोसिएशन ने इसे गंभीर समस्या बताते हुए जल्द कार्रवाई की मांग की है।
CMR Delivery Delay Haryana : CMR डिलीवरी की अंतिम तारीख 30 सितंबर तक बढ़ी
राइस मिलर्स एसोसिएशन ने बताया कि CMR डिलीवरी की मूल अंतिम तारीख 30 जून थी। परिस्थितियों को देखते हुए इसे बढ़ाकर अब 30 सितंबर कर दिया गया है।
हालांकि, मिलर्स का कहना है कि समय सीमा बढ़ने के बावजूद तैयार CMR को FCI की ओर से निर्धारित गति से स्वीकार नहीं किया जा रहा है। यदि स्वीकृति की प्रक्रिया में तेजी नहीं आई तो निर्धारित लक्ष्य को समय पर पूरा करने में परेशानी हो सकती है।
CMR Delivery Delay Haryana : तैयार चावल का स्टॉक पड़ा रहने से बढ़ रहा आर्थिक बोझ
मिलर्स के अनुसार तैयार CMR की स्वीकृति में देरी से उनकी कार्यशील पूंजी लंबे समय तक फंसी रहती है। दूसरी ओर मिलों को कर्मचारियों और श्रमिकों के वेतन, बैंक कैश क्रेडिट और अन्य ऋणों के ब्याज, बिजली के फिक्स्ड और रनिंग चार्ज सहित कई खर्च लगातार उठाने पड़ रहे हैं।
इसके अलावा गोदाम और भंडारण, सुरक्षा-बीमा, हैंडलिंग तथा मशीनरी के रखरखाव पर भी खर्च हो रहा है। एसोसिएशन का कहना है कि लंबे समय तक तैयार स्टॉक के पड़े रहने से मिलर्स पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है।
CMR Delivery Delay Haryana : स्टॉक में नमी और गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका
राइस मिलर्स ने तैयार CMR के लंबे समय तक गोदामों में पड़े रहने से जुड़ी दूसरी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि लंबे भंडारण के कारण नमी बढ़ने, वजन में कमी आने और चावल की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
इसके साथ ही कीट प्रकोप जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में मिलर्स को अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ सकता है। एसोसिएशन ने मांग की है कि ऐसी परिस्थितियों में होने वाले वास्तविक नुकसान के लिए उचित राहत और क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया जाए।
CMR Delivery Delay Haryana : मिलर्स ने केंद्र के सामने रखीं आठ प्रमुख मांगें
एसोसिएशन ने सुभाष बराला के माध्यम से केंद्र सरकार और FCI के सामने आठ प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सबसे प्रमुख मांग लंबित 6.94 लाख मीट्रिक टन CMR को तत्काल स्वीकार करने की है।
इसके साथ ही मिलर्स ने निर्धारित लक्ष्य पूरा करने के लिए पर्याप्त समय देने, स्पष्ट डिलीवरी शेड्यूल जारी करने और CMR स्वीकार करने की प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग की है। एसोसिएशन चाहता है कि मिलों को अपनी डिलीवरी की योजना बनाने के लिए स्पष्ट व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
CMR Delivery Delay Haryana : पेनल्टी और अतिरिक्त खर्च से राहत की मांग
राइस मिलर्स ने मांग की है कि डिलीवरी और स्वीकृति में होने वाली देरी के लिए उन्हें अनावश्यक पेनल्टी, ब्याज अथवा सिक्योरिटी फॉरफीचर जैसी कार्रवाई से राहत दी जाए।
इसके अलावा नमी, वजन में कमी या गुणवत्ता प्रभावित होने की स्थिति में उचित राहत और क्षतिपूर्ति की मांग भी की गई है। लेबर, बिजली, बैंक ब्याज और भंडारण जैसे अतिरिक्त खर्च को देखते हुए आर्थिक राहत देने की मांग भी एसोसिएशन ने रखी है।
CMR Delivery Delay Haryana : मिलर्स, किसान और सरकार के बीच समन्वय जरूरी
फतेहाबाद राइस मिलर्स एसोसिएशन ने कहा कि धान की खरीद और मिलिंग से लेकर CMR की डिलीवरी तक पूरी व्यवस्था में मिलर्स, किसान और सरकार महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। किसी एक स्तर पर लंबे समय तक समस्या रहने से पूरी खरीद और भंडारण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
एसोसिएशन ने उम्मीद जताई कि सुभाष बराला के माध्यम से केंद्र सरकार और FCI के स्तर पर लंबित CMR की स्वीकृति को लेकर जल्द समाधान निकलेगा। मिलर्स का कहना है कि समयबद्ध कार्रवाई होने से न केवल राइस मिलों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव कम होगा, बल्कि सरकारी खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था को भी सुचारु रखने में मदद मिलेगी।

