MP Pensioners Dearness Relief : पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के प्रयासों से मिली बड़ी सफलता
MP Pensioners Dearness Relief : मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पेंशनरों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के लगातार प्रयासों और न्यायालय में याचिका दायर किए जाने के बाद दोनों राज्य सरकारों ने मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 49 के तहत महंगाई राहत (Dearness Relief) देने से पहले आवश्यक सहमति लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। इस फैसले पर एसोसिएशन ने दोनों राज्य सरकारों का आभार व्यक्त किया है।

MP Pensioners Dearness Relief : हाईकोर्ट में दायर की गई थी रिट याचिका
पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने धारा 49 से जुड़े प्रावधानों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ में रिट याचिका दायर की है। इस मामले में केंद्र सरकार के साथ-साथ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार को भी नोटिस जारी किए गए हैं।एसोसिएशन का दावा है कि न्यायालय में दिए गए जवाब में मध्यप्रदेश सरकार पुनर्गठन अधिनियम के तहत सहमति लेने की अनिवार्यता का स्पष्ट कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।
MP Pensioners Dearness Relief : 81 महीने की बकाया महंगाई राहत देने की मांग
एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष आमोद सक्सेना, संरक्षक गणेश दत्त जोशी और भोपाल जिला अध्यक्ष सुरेश शर्मा ने दोनों राज्य सरकारों से 81 महीने की लंबित महंगाई राहत का शीघ्र भुगतान करने की मांग की है।उन्होंने कहा कि वर्षों से लंबित इस राशि का भुगतान पेंशनरों के हित में जल्द किया जाना चाहिए।
MP Pensioners Dearness Relief : 25 वर्षों तक शोषण का लगाया आरोप
पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन का कहना है कि मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम में सहमति लेने का ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, इसके बावजूद दोनों राज्य सरकारें पिछले लगभग 25 वर्षों से इसी आधार पर पेंशनरों को समय पर महंगाई राहत देने में देरी करती रहीं।एसोसिएशन का आरोप है कि इससे लाखों पेंशनरों के आर्थिक हित प्रभावित हुए हैं।
MP Pensioners Dearness Relief : पेंशनरों को अब आगे क्या उम्मीद
सहमति की अनिवार्यता समाप्त होने के बाद पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन को उम्मीद है कि भविष्य में महंगाई राहत जारी करने की प्रक्रिया अधिक सरल और समयबद्ध होगी। साथ ही संगठन ने सरकार से लंबित 81 महीने की महंगाई राहत का भुगतान भी जल्द करने की मांग दोहराई है।हालांकि, बकाया राशि के भुगतान और न्यायालय में लंबित मामले पर अंतिम निर्णय संबंधित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

