Iran US Deal : ईरान और अमेरिका के बीच आखिरकार वो समझौता हो ही गया जिसका इंतजार पूरी दुनिया को था | राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते पर आधिकारिक रूप से साइन किए…जिसके तहत रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खोला जाएगा….ट्रंप ने फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के दौरान इस पर साइन किए…..अब 14 बिंदुओं वाले इस समझौते को मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) कहा गया है….जिसके मुताबिक़ ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा…साथ ही, देश के “पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास” के लिए 300 अरब डॉलर का फंड बनाया जाएगा..
Iran US Deal : ईरान-अमेरिका डील डन, G-2 से बढ़ेगी ग्लोबल टेंशन
.यह समझौता अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमले शुरू होने के चार महीने बाद आया है….लेकिन इसमें इजराइल की प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं है उधर इसका ईरान को तभी फायदा मिलेगा, जब वह अपनी सभी प्रतिबद्धताओं का पालन करेगा…उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने G2 जिसमे अमेरिका के साथ चाइना होगा का जिक्र करके भारत की टेंशन बढाई है, ऐसे में दो बड़े सवाल है ईरान अमेरिका का करार कितना होगा कारगर ? और अमेरिका की चाइना के साथ नजदीकियां भारत के लिए कितनी बड़ी खतरे की घंटी ?

Iran US Deal : 28 लाख करोड़ रूपए की योजना तैयार, ईरान नहीं बनाएगा परमाणु हथियार !
एक स्टिंग….अटैक वाला उसके बाद समझौता मीटिंग का एक ही में मिक्स बनेगा लंबे इन्तजार के बाद ईरान अमेरिका के बीच समझौता हो ही गया | यानि पूरी दुनिया जो तेल और उर्जा संकट से जूझ रही थी उसे थोड़ी राहत मिलेगी | चलिए सबसे पहले नजर डालते है उन बिन्दुओं पर जिसके तहत समझौता हुआ…
Iran US Deal : ईरान-अमेरिका समझौते के मुख्य बिंदु
• पहले बिंदु में कहा गया है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी
• “हर मोर्चे” पर सैन्य अभियान तुरंत और स्थायी रूप से खत्म करने की घोषणा करेंगे
• इसमें लेबनान भी शामिल है, ट्रंप लगातार इस बात को लेकर चिंतित थे कि हिज़्बुल्लाह के खिलाफ
• इजराइल की सैन्य कार्रवाई ईरान के साथ हुए समझौते को बिगाड़ सकती है
• ईरान कई बार कह चुका है कि युद्धविराम में लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए
• ईरान ने कहा कि अगर इजराइल लेबनान में सैन्य अभियान जारी रखता है
• तो यह “समझौते का उल्लंघन” होगा, ऐसी स्थिति में “ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे”
Iran US Deal : अमेरिका की G-2 की रणनीति, भारत के लिए खतरे की घंटी ?
• दूसरा बिंदु अमेरिका और ईरान एक-दूसरे की “संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता” का सम्मान करेंगे
• दोनों एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे
• दस्तावेज़ के तीसरे बिंदु के अनुसार, अमेरिका और ईरान अधिकतम 60 दिनों के भीतर
• अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने की कोशिश करेंगे
• अगर दोनों पक्ष सहमत हों, तो इस समय सीमा को आगे बढ़ाया जा सकता है
• दोनों देशों के नेताओं के एमओयू पर आधिकारिक हस्ताक्षर होने के बाद
• 60 दिनों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, व्हाइट हाउस के अनुसार
Iran US Deal : अमेरिका का QUAD को कम महत्व देना…
• ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भी इस पर साइन किए हैं
• चौथे बिंदु के अनुसार, एमओयू पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना शुरू करेगा
• ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए “किसी भी तरह के व्यवधान या बाधाओं” को भी हटाएगा
• पांचवे बिंदु को देखें तो अमेरिका का मानना है, ईरान अपने अधिकारों को आक्रामक
• तरीके से लागू करेगा, लेकिन खाड़ी देश कभी भी ऐसा भविष्य स्वीकार नहीं करेंगे
• जिसमें वहां टोल प्रणाली लागू हो
• एमओयू के छठे बिंदु में कहा गया है कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय साझेदार
• ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर
• (224 अरब पाउंड) की योजना तैयार करेंगे, अंतिम समझौते के 60 दिनों के भीतर सहमति बनेगी
Iran US Deal : इंडो-पैसिफिक कमांड से ‘इंडो’ हटाने के मायने क्या ?
• सभी लाइसेंस, छूट और अनुमति अमेरिका देगा
• हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका आर्थिक रूप से इसमें शामिल होगा.
• ट्रंप और अन्य अधिकारियों ने बार-बार अमेरिकी जनता को यह स्पष्ट किया है, कि अमेरिका
• सीधे ईरान को पैसा नहीं देगा,
• सातवे बिंदु के अनुसार, अमेरिका ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध समाप्त करेगा
• इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंध और अमेरिका के लगाए गए
• एकतरफा प्रतिबंध भी शामिल हैं, हालांकि इसकी समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है
• आठवां बिंदु कहता है, ईरान ने सहमति दी है, वह परमाणु हथियार नहीं खरीदेगा और न ही हासिल करेगा
• दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हैं कि ईरान के पास पहले से मौजूद
• संवर्धित यूरेनियम का समाधान किया जाएगा
• 9वां और 10वां बिंदु कहता है, कि समझौते के अगले दो हिस्सों में कहा गया है कि संवर्धित
• यूरेनियम का समाधान होने तक अमेरिका और ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा
• स्थिति में बनाए रखेंगे, ट्रंप ने इस साल की शुरुआत में कहा था, “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी”
• शुरू करने का उनका 99 प्रतिशत उद्देश्य यही था कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके
• दस्तावेज़ के 11वें बिंदु में कहा गया है कि एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद
• अमेरिका “फ़्रीज़ या प्रतिबंधित फंड पूरी तरह उपलब्ध कराने” का वादा करता है
• इसकी प्रक्रिया बातचीत के दौरान तय की जाएगी, एमओयू के बाद की बातचीत जारी रहने के दौरान
• कुछ संपत्तियां जारी की जाएंगी, ऐसा तब किया जाएगा जब ईरान समझौते की शर्तों का पालन करेगा
• दस्तावेज़ के अंतिम बिंदुओं में बताया गया है कि अमेरिका और ईरान एमओयू के पालन और
• भविष्य के अंतिम समझौते की निगरानी के लिए एक “व्यवस्था” बनाएंगे
• अंत में, एमओयू में कहा गया है कि अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी
• प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी जाएगी
अब इन समझौतों का कौन कितना पालन करेगा ये तो समय बताएगा | लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘G-2’ (अमेरिका और चीन) का जिक्र वैश्विक राजनीति में एक संभावित बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। ‘G2’ का मतलब है ग्रुप ऑफ टू यानी आसान भाषा में कहें तो दो देशों की आपसी साझेदारी.. इसका अर्थ है कि अमेरिका अब चीन को एक बराबरी की महाशक्ति के रूप में मान्यता दे रहा है और दोनों देश मिलकर दुनिया की दिशा तय कर सकते हैं। जो भारत के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है, ट्रंप के इस रणनीतिक कदम और बयान के पीछे की मुख्य वजहें ये मानी जा रही है…
Iran US Deal : G-2 की रणनीति,भारत के लिए खतरे की घंटी
• ट्रंप बहुपक्षीय संगठनों या गठबंधनों की तुलना में चीन के साथ सीधे द्विपक्षीय बातचीत को प्राथमिकता दे रहे हैं
• चीन की तरफ से अमेरिकी सोयाबीन की खरीद फिर से शुरू करने और अन्य आर्थिक मामलों पर
• दोनों देशों के बीच सहमति बन रही है
• दुनिया में चीन और अमेरिका सह-शासन की ओर बढ़ सकते हैं, जहाँ दुनिया के बड़े विवाद और निर्णय
• इन दो महाशक्तियों के बीच सुलझाए जा सकते हैं
• उधर भारत और अन्य देशों पर इसका बड़ा प्रभाव हो सकता है
• यूरोप और अन्य पारंपरिक सहयोगी देश जो चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ
• एकजुट होना चाहते थे, ट्रंप की इस नीति से असहज महसूस कर रहे हैं
• G-2 के उदय और क्वाड (QUAD) की गतिविधियों में कमी को भारत के रणनीतिक हितों के लिए
• एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है, भारत अपनी विदेश नीति में बदलाव करते हुए
• यूरोप और ‘ग्लोबल साउथ’ के साथ संबंध मजबूत कर रहा है
• भारत नहीं चाहता कि एशिया में सिर्फ एक ताकत हावी हो, भारत का मानना है कि अगर चीन
• अकेला क्षेत्रीय महाशक्ति बन गया, तो उसका असर भारत की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और
• कूटनीतिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा,यही वजह है कि भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर
• QUAD को मजबूत किया, लेकिन अमेरिका और चीन आपस में समझौते करने लगें तो भारत की
• पूरी रणनीतिक गणित बदल सकती है, एक अहम पहलू ये भी है कि ट्रंप का बार-बार ‘G2’ का जिक्र करना
• QUAD को कम महत्व देना और इंडो-पैसिफिक कमांड से ‘इंडो’ हटाना ऐसे संकेत हैं
• जिन्हें भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता
बहरहाल एक तरफ मिडिल ईस्ट के तनाव पर राहत नजर आ रही है तो दूसरी तरफ G2 की रणनीति भारत के लिए बड़ा सिरदर्द | जाहिर है यह सिर्फ अमेरिका और चीन की दोस्ती का सवाल नहीं है. यह उस वैश्विक व्यवस्था का सवाल है जिसमें नई दिल्ली खुद को एक उभरती महाशक्ति के रूप में देखती है….ऐसे में भारत के सामने आने वाली चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती हैं…जिसका सही और सटीक कदम क्या होगा ये बड़ा सवाल है |

