Sabarimala Supreme Court : ‘अंधविश्वास है या नहीं, हम तय करेंगे’,सबरीमला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Sabarimala Supreme Court : केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर को लेकर कानूनी और सियासी घमासान तेज है। सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच इस मुद्दे पर सीधा टकराव देखने को मिल रहा है, जहां एक तरफ संवैधानिक अधिकारों की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ परंपरा और आस्था का सवाल खड़ा है।
Sabarimala Supreme Court : केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां मामला सीधे तौर पर सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव का रूप ले चुका है। यह सिर्फ धार्मिक परंपरा का मुद्दा नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकार और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा भी बन गया है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक पीठ की अंतिम सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हो चुकी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह पीठ 2018 के उस फैसले की समीक्षा कर रही है, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। खास तौर पर मामला इस बात पर केंद्रित है कि क्या मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक धार्मिक स्वतंत्रता के तहत वैध है या यह समानता के अधिकार का उल्लंघन। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने धार्मिक स्थलों पर भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी खास वर्ग या संप्रदाय को मंदिरों और ‘मठों’ में प्रवेश से रोका जाता है, तो इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और यह समाज को बांटने का काम करेगा। तो वहीं सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि जज कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं, जज यह तय नहीं कर सकते कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है और कौन सी नहीं, यह अधिकार विधायिका का है। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक प्रथाओं को व्यक्तिगत गरिमा के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए।

Sabarimala Supreme Court : सबरीमाला मंदिर विवाद में क्या हैं शीर्ष अदालत की टिप्पणी और केंद्र सरकार का तर्क डालते हैं एक नजर।
मंदिरों-मठों में किसी खास वर्ग के प्रवेश को रोकना, सामाजिक एकता को खंडित करता है, हिंदू धर्म के लिए भी नकारात्मक।
धार्मिक परंपराओं के नाम पर किसी को बाहर रखना संवैधानिक और धार्मिक दृष्टि से सही नहीं।
अदालत के पास यह तय करने का अधिकार, कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है (जैसे सती प्रथा)।
यदि कोई प्रथा संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है, तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप कर सकता है।
जस्टिस नागरत्ना - धर्म के नाम पर किसी को बाहर करना सामाजिक एकता के लिए ठीक नहीं।
जस्टिस बागची - जब किसी प्रथा या सम्प्रदाय के अस्तित्व पर विवाद होता है, तो उसका समाधान न्यायालय ही करता है।
धार्मिक प्रथाओं, देवता की प्रकृति और आस्था की परिभाषा तय करने का अधिकार अदालत के पास। Sabarimala Supreme Court : शीर्ष अदालत में सरकार का पक्ष (केंद्र)
शीर्ष अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से दिया तर्क।
जज कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं
जज यह तय नहीं कर सकते कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, कौन सी नहीं, यह अधिकार विधायिका का है।
धार्मिक प्रथाओं को व्यक्तिगत गरिमा के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए।
यह पाबंदी लैंगिक रूढ़ियों या पितृसत्ता पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट संप्रदाय की परंपरा, जो भगवान अयप्पा की ब्रह्मचारी प्रकृति से जुड़ी है।
केंद्र ने कहा 2018 का वह फैसला, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति, उसे पलटा जाना चाहिए। क्योंकि वह धार्मिक भावनाओं को समझने में विफल रहा।
सॉलिसिटर जनरल - भारत में ऐसे मंदिर भी हैं जहां केवल महिलाएं जा सकती हैं।
आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत हर संप्रदाय को अपनी प्रथाओं का पालन करने का अधिकार, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा न हो।केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि 2018 का फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाओं को निचले स्तर पर रखा गया। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में तर्क दिया है कि धार्मिक प्रथाएं आस्था का मामला हैं और कोर्ट को अंधविश्वास तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, जबकि न्यायालय ने समानता के आधार पर महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया है।
Sabarimala Supreme Court : सबरीमाला पर सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट
केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर को लेकर एक बार फिर कानूनी और सियासी हलचल तेज है। महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने केंद्र और राज्य सरकारों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। ताजा सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत में धार्मिक परंपराओं और आस्था के सम्मान की बात कही, जबकि राज्य सरकार का रुख कानून के पालन और व्यवस्था बनाए रखने पर केंद्रित है। अदालत ने भी साफ संकेत दिए हैं कि संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन जरूरी है।
सबरीमला विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में है और चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9-जजों की संविधान बेंच केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े कथित भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
सबरीमाला विवाद केरल के अयप्पा मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से संबंधित है, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बताया था। वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट की 9-सदस्यीय बेंच इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता पर लगातार सुनवाई कर रही है।
Sabarimala Supreme Court : क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध और अन्य धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ इस बात की जांच कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किस हद तक समानता के अधिकार के साथ मेल खाता है।
Sabarimala Supreme Court : अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक समूह का अपना मामला प्रबंधित करने का अधिकार अनुच्छेद 26, किसी व्यक्ति के पूजा करने के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 25 से बड़ा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि धर्म के नाम पर किसी वर्ग को बाहर करना धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि उसे कमजोर करना है।
यह सुनवाई सबरीमाला जैसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को तय करने के लिए की जा रही है।
केरल सरकार और मंदिर प्रशासन ने अपने-अपने तर्क रखे। जहां एक पक्ष ने समान अधिकार की वकालत की, वहीं दूसरे ने परंपरा और आस्था को प्राथमिकता दी।
दरअसल सबरिमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक रूप से रोक रही है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, खासकर केरल में।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसके आदेशों का पालन होना चाहिए और किसी भी तरह की अवमानना बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही, कोर्ट ने राज्य सरकार से कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर जवाब भी मांगा है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी भी तेज हो गई है। एक ओर जहां कुछ दल इसे महिलाओं के अधिकारों का सवाल बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसे आस्था और परंपरा से जुड़ा मुद्दा बताया जा रहा है।
यह सुनवाई सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में महिलाओं के धार्मिक अधिकार, लैंगिक समानता और परंपराओं की संवैधानिक वैधता को प्रभावित कर सकती है। यह मामला लंबे समय से आस्था बनाम समानता के अधिकार की बहस का केंद्र बना हुआ है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो न सिर्फ सबरीमाला बल्कि देशभर में धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की दिशा तय कर सकता है। सबरीमाला विवाद अब केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि यह भारत में आस्था बनाम अधिकार की बड़ी बहस का केंद्र बन चुका है। ऐसे में माना जा सकता है कि सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले समय में धार्मिक आस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

