भैया, ना खुशियाँ खरीद पाया, ना ग़मों का ठेला खोल पाया, फिर भी हर सुबह “सेल” लगा कर कमाने निकल आया। जेब में सपने, माथे पर पसीना, ज़िंदगी बोली, भाई, तू है बड़ा नगीना ! नारी को जो सताए, उसका इतिहास मिट जाए, रावण, कौरव, कंस सबक बन जाए। संत को जो छेड़े, उसका वैभव भी रूठे, धन, वंश, शोहरत सब ताश के पत्ते टूटे। चलो पुराने दोस्तों के दरवाज़े खटखटाएँ, देखें उनके पंख थके या अब भी फड़फड़ाएं। हंसते हैं खुलकर या होंठ दबाकर मुस्कुराते हैं, अपनी कहानी कहते हैं या बस “सक्सेस” सुनाते हैं। हमको देखकर गले लगाएं या घड़ी दिखाएं, भाई, कभी फुरसत में आना, कहकर टाल जाएं।
Hasya Hathauda : दिल भावनाओं का मोहताज है
पैसे से पेट भरे, पर दिल भूखा रह जाता है, नोटों की गड्डी में भी अपनापन नहीं आता है, क्योंकि दिल भावनाओं का मोहताज है। गलत होना गुनाह नहीं, पर खुद को सही बताना ही अपनी छवि की असली गवाही है। जिंदगी का आनंद अपने तरीके ही लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है।
Hasya Hathauda : मुर्दा बोला, रोते हो मेरे जाने पर, उठ जाऊं तो जीने न दोगे ठिकाने पर !
बुराई कितनी भी भारी हो जाए, अंत में अच्छाई ही मुखाग्नि दिलाए। चींटी से मेहनत, बगुले से ध्यान, मकड़ी से सीखो जाल का विज्ञान। संघर्ष को कोसोगे तो क्या पाओगे? अच्छा दिन खुशियां, बुरा दिन सबक सिखाएगा, तभी सफल कहलाओगे। ज़माना बड़ा निराला है साहब, कामयाब पर हंसता भी है, जलता भी बेहिसाब। मिलावट का दौर है, हां में हां मिलाओ, सच बोलोगे तो रिश्ते अनफॉलो कर दिए जाए।

Hasya Hathauda : इंसान को इंसान से दूर करे वो सामान, पहली जुबान, दूसरा धनवान ।
Hasya Hathauda : गुरूर की छत पर जो चढ़े जनाब, अपना ही मकान न देख पाए जनाब। इंसान को इंसान से दूर करे वो सामान, पहली जुबान, दूसरा धनवान। रिश्तों को कभी दौलत की निगाह से मत देखना क्योंकि साथ निभाने वाला इंसान अक्सर गरीब ही होता है। बच्चों को गीता आज पढ़ाओ, कल अदालत में कसम से बचाओ। संस्कार जहां प्रहरी बन जाए, वहां अपराध खुद शरमाए। ज़िंदगी का यह सारा प्रसंग, थोड़ा दर्शन, थोड़ा व्यंग। सच कड़वा है, पर बात खरी-खरी, हंसते-हंसाते समझ लो ज़रा ज़िंदगी की डगरी। यही है हास्य भी हथौड़ा भी।

