Hasya Hathauda 08 : आज का हास्य हथौड़ा कॉन्वेंट स्कूल मानसिकता पर, ‘इंपोर्टेड है’, अगले कॉलम में पढ़िए..
भैया, अंग्रेजों की गुलामी से आजादी तो हमें 1947 में मिल गई, लेकिन असली आज़ादी अभी एलकेजी में अटकी हुई है। कारण साफ़ है, कॉन्वेंट मानसिकता। आज हमारे देश में शिक्षा नहीं, इंग्लिश स्टेट्स बिकता है। बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, बस “Yes Madam” बोलना आना चाहिए।
हालात ऐसे हैं कि बड़े बड़े मिशनरीज स्कूल तो छोड़िए जैसे ही किसी कॉलोनी में कॉन्वेंट स्कूल खुलता है, एडमिशन लिस्ट इतनी लंबी हो जाती है कि लगता है, यह स्कूल नहीं, रेलवे की वेटिंग टिकट है। बच्चा ABCD सीखे न सीखे, माता-पिता को इतना संतोष जरूर मिल जाता है कि हमारा बच्चा कॉन्वेंट में पढ़ता है।
Hasya Hathauda 08 : भाषा से नहीं, हीनभावना से दिक्कत है !
भाषा संवाद का माध्यम है, चाहे हिंदी हो, अंग्रेजी हो या छत्तीसगढ़ी। किसी भाषा से दुश्मनी नहीं है, अंग्रेजी से भी नहीं। लेकिन समस्या तब होती है जब भाषा ज्ञान नहीं, घमंड बन जाए। हमारे यहाँ अंग्रेजी बोलना बुद्धिमानी नहीं, स्टेटस सिंबल माना जाता है। हिंदी में बोलो तो गंवार, अंग्रेजी में टूटी-फूटी बोल दो तो तथाकथित इंटेलेक्चुअल।
Hasya Hathauda 08 : कॉन्वेंट की कहानी, जो सिलेबस में नहीं है ।
अब ज़रा कॉन्वेंट शब्द की उत्पत्ति पर आते हैं, यह विषय न NCERT में है, न कॉन्वेंट की प्रॉस्पेक्टस बुक में। इसकी कहानी ये है 1600 के आसपास ब्रिटेन में बिना विवाह साथ रहने की परंपरा थी। तब नाजायज संतान होने पर ऐसे बच्चों को चर्च में छोड़ दिया जाता था। जब ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी, तब उनके लिए कॉन्वेंट बनाए गए, जहाँ फादर, मदर और सिस्टर नियुक्त किए गए ताकि बच्चों को रिश्तों का एहसास हो सके।
यानी सीधे शब्दों में कहें तो कॉन्वेंट उन बच्चों के लिए बना, जिनके रिश्ते समाज को समझ नहीं आते थे, और आज भारत में? बजरंग बली कॉन्वेंट स्कूल’ माँ भगवती कॉन्वेंट, मां सरस्वती कॉन्वेंट स्कूल जैसे संस्थान खुल रहे हैं, अब इन्हें कौन समझाए कि बजरंग बली के नाम से कॉन्वेंट स्कूल खोलना उतनी बड़ी मूखर्ता है, जितनी कि गणेश जी को टाई कोट पहना देना। लेकिन लोग ऐसा कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर प्रमाण हैं।

भारत में कॉन्वेंट कल्चर की शुरूआत 1842 में कलकत्ता से हुई। जब अंग्रेजों ने पहला स्कूल खोला था, तब हम गुलाम थे। उसके बाद अंग्रेजों ने विश्वविद्यालय बनाए, कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास और वही ढांचा आज भी जस का तस चल रहा है।
लॉर्ड मैकाले ने साफ़ कहा था, ऐसे लोग तैयार करो जो रंग और खून में भारतीय हों, लेकिन सोच और संस्कार में अंग्रेज। दरअसल मैकाले ये जान चुका था कि भारतीयों को गुलाम बनाया जा सकता है तो सिर्फ उनकी सांस्कृतिक विरासत में सेंध लगा कर।
भैया, मिशन इतना सफल रहा कि आज भी हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है और अंग्रेजी बोलते हुए सीना चौड़ा हो जाता है।
Hasya Hathauda 08 : अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है ?
वाह! दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी केवल 11 देशों में मूल रूप से बोली जाती है फिर भी हमें यही सिखाया गया, कि अंग्रेजी नहीं आई तो कुछ नहीं आएगा।
विडंबना देखिए, बाइबिल अंग्रेजी में नहीं थी, ईसा मसीह की भाषा अरमेक थी और अरमेक की लिपि हमारी बंगला से मिलती-जुलती थी, फिर भी हम उसी अंग्रेजी को भगवान बना बैठे हैं। सबसे बड़ा मज़ाक हम खुद पर हैं, दुर्भाग्य यह है कि जिन परंपराओं को अंग्रेज छोड़ गए, उनकी छोड़ी हुई गुलामी को हमने गले लगा लिया। आज हम अपने ही बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि हिंदी में बोलोगे तो आगे नहीं बढ़ोगे।
Hasya Hathauda 08 : अरे भैया, जिसे अपनी भाषा पर शर्म हो, वह आत्मविश्वास कहाँ से लाएगा ?
शिक्षा जरूरी है, अंग्रेजी भी जरूरी है, लेकिन आत्मसम्मान से बड़ी कोई भाषा नहीं। कॉन्वेंट स्कूल नहीं, कॉन्वेंट मानसिकता से आज़ादी चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी, पापा, क्या हम भारतीय हैं ?

