Tricolour Flag: देश में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का निर्माण बेहद सीमित स्थानों पर किया जाता है। इन्हीं में से एक प्रमुख केंद्र है ग्वालियर स्थित मध्य भारत खादी संघ, जहां ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) से प्रमाणित तिरंगे बनाए जाते हैं। देश में अब केवल ग्वालियर और कर्नाटक के हुबली में ही उच्च मानकों के साथ राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण किया जा रहा है।

मध्य भारत खादी संघ में तैयार होने वाला तिरंगा 9 सख्त मानकों पर जांच के बाद अंतिम रूप लेता है। कपास की कताई, बुनाई, रंगाई से लेकर सिलाई, नपाई और पैकिंग तक की पूरी प्रक्रिया में लगभग 55 दिन लगते हैं। धागे से लेकर तैयार झंडे तक का यह सफर कारीगरों की मेहनत और कौशल का उदाहरण है।
Tricolour Flag: 16 राज्यों में भेजे जाते हैं ग्वालियर के तिरंगे
ग्वालियर के जीवाजी गंज क्षेत्र में स्थित इस खादी संघ की वर्कशॉप से देश के 16 से 17 राज्यों में राष्ट्रीय ध्वज भेजे जाते हैं। देश में फहराए जाने वाले कुल तिरंगों में से करीब 40 प्रतिशत झंडे यहीं बनाए जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस से पहले यहां दिन-रात काम चलता है ताकि बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।

हाथ से होती है सिलाई, खास रस्सी का होता है इस्तेमाल
राष्ट्रीय ध्वज को अंतिम रूप हाथ से सिलाई करके दिया जाता है। झंडे को फहराने वाली रस्सी सामान्य नहीं होती, बल्कि सीसल वुड से बनी विशेष रस्सी का उपयोग किया जाता है। पहले यह रस्सी विदेश से मंगाई जाती थी, लेकिन अब यह पश्चिम बंगाल में उपलब्ध है। इसकी कीमत लगभग 495 रुपए प्रति किलो है।

लैब में होती है हर झंडे की फाइनल जांच
खादी संघ की लैब में हर तिरंगे की नपाई, रंग, चक्र के आकार और फोल्डिंग तक की जांच होती है। झंडे को मोड़ने का भी नियम तय है, जिसमें केसरिया रंग अंदर और हरा रंग ऊपर रखा जाता है। लकड़ी की गुल्ली और रस्सी भी मानकों के अनुरूप होनी जरूरी होती है।
Tricolour Flag: तीन साइज में बनते हैं BIS प्रमाणित तिरंगे
यहां बीआईएस प्रमाणित तिरंगे तीन साइज में तैयार किए जाते हैं:
- 2 × 3 फीट
- 6 × 4 फीट
- 3 × 4.5 फीट
हर साइज में कपड़े की गुणवत्ता, रंगों की गहराई और अशोक चक्र के माप का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस वर्ष अब तक 60 से 70 लाख रुपए के झंडों के ऑर्डर मिल चुके हैं।

Tricolour Flag: लाल किले पर भी फहरा चुका है ग्वालियर का तिरंगा
मध्य भारत खादी संघ में बने तिरंगे लाल किले पर भी फहराए जा चुके हैं। इसके अलावा ये झंडे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, ओडिशा, अंडमान-निकोबार और देश की एम्बेसियों तक भेजे जाते हैं।

1925 से शुरू हुआ तिरंगे का सफर
Gwaliorपिछले वर्ष संघ का टर्नओवर लगभग 4.18 करोड़ रुपए रहा। बढ़ती मांग के चलते 1 अप्रैल से 15 अगस्त 2025 के बीच व्यापार 99 लाख रुपए तक पहुंच गया। इस दौरान 26 हजार से अधिक झंडे बनाए गए। आगामी 26 जनवरी के लिए संघ को 1.30 करोड़ रुपए से अधिक के ऑर्डर प्राप्त हुए हैं।
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